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किसी एक दिन
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शेर ! मेरे पास आ
तुझे अपने पास पड़ी
बकरे की पुरानी खाल उड़ा दूं
इसे ओढ़ कर तू घास – पात पर
मुंह तो मार सकेगा
भूख को दुलार तो सकेगा
देख- तेरी खाल ओढ़ कर बकरे
हर क्षण नया शिकार कर रहे हैं
उनकी शाकाहारी दाढ़ों पर
खून का रंग चढ़ गया है
तू उस वक्त कहां था
जब ये तेरी मांद में
बारुद बिछा रहे थे
वनराज कहने की ऐंठ छोड़ दें
अब तो पूरा जंगल ही
बकरों की सल्तनत हो गया है
उनके बीच तुझे
रेगिस्तान में खदेड़ देने का
प्रस्ताव भी पारित हो गया है
अब तू दहाड़ मत
तेरी आवाज़ बेअसर हो चुकी है
तेरे दांत और नाखून तुझसे छीन कर
म्यूजियम में रखे जा चुके हैं
जिन्हें देखना सैलानियों का शगल हो गया है
शेर ! तू जिसका वाहन था — वह भी
सरेआम गिरफ्तार करके
अन्ध कोठरी में कैद कर दी गई है
तू आज तक अपने वंश
अपनी संस्कृति की जमुहाइयां लेता रहा — और
इसी बीच तेरा वजूद ही मिटा दिया गया
आ ! मेरे पास आ
तुझे नये सिरे से शेर बनाने के लिए
बकरे की पुरानी खाल उड़ा दूं
ताकि तू — इनके बीच रहकर
किसी एक दिन
इन्हें
सीधा का सीधा चीर सके ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आज की कविता में बकरे और शेर के स्वभाव परिवर्तन के संकेत छुपे हुए हैं ।बकरे सदा से ही डरपोक स्वभाव के होते हैं । शेर जंगल का राजा माना जाता है और वह स्वभाव से दुस्साहसी माना जाता है ।शेर की प्रजाति को संस्कृति में पौरुष का प्रतीक भी माना जाता है ।यह संस्कृति के शुभ शगुन में भी गणनीय है ।शेर सत्ता का प्रतीक है ।शक्ति की देवी दुर्गा का यह वाहन है ।ऐसी अवस्था में उसका यह पराभव सचमुच खटकने वाला है।शेर की अविजित सत्ता पर बकरों की प्रजाति का कब्जा और सत्ता हस्तांतरण का खेल बन जाना विस्मित करने वाला है ।सत्ता हमेशा निर्भय , साहसी, वीर, शक्तिशाली के हाथ में ही शोभा देती है । बकरों की प्रजाति में इस तरह के गुणों का अभाव रहता है ।ये स्वभाव से भीरु प्रकृति के होते हैं और इनकी हर कहीं बलि दे दी जाती है ।शक्ति भी इनकी सीमित होती है ।इस समय भारत की वर्तमान सत्ता में इसके लक्षण देखे जा सकते हैं । सत्ता की शक्ति का बल क्षीण होने पर जो दुर्दशा उभरी है । कविता में उसी के संकेत गहरे और गंभीर नजर आ रहे हैं । बकरों ने सत्ता हथिया ली है शेर से और यह विसंगत यथार्थ इसी का नतीजा है ।आज नेतृत्व कारी शक्ति तन बल ,बुध्दिबल और आत्मबल से हीन है । विश्व सत्ता के समक्ष वह बुध्दि शून्य बनी मिमिया रही है । बकरों ने छल बल से सत्ता हासिल कर ली है । है ! जन रुपी शेर तेरा आत्मबल और चेतना ,विवेक उस समय कहां था जब जन सत्ता की मांद में बारुद बिछा रहे थे ।आज वर्तमान सत्ता भी मिमिया रही है और जन सत्ता को खदेड़ दिया गया है ।अब सत्ता की वापसी के लिए बकरों की सल्तनत के ही तौर तरीके शेर को भी सीखने होंगे ।तब ही जन गण मन की सत्ता की स्थापना हो सकेगी ।बकरे और शेर का यह कथानक जन आक्रोश और क्रोध की अभिव्यक्ति है । बकरों के समान सत्ता का मिमियाना हर एक को आवेश से भर रहा है ।जन शेर का भ्रष्ट सत्ता रुपी बकरों से सत्ता को छीनने के लिए बकरा बनान याने भेस बदलना ही है । शेर तो शेर ही रहेगा । अपना बुध्दि चातुर्य जगाना और अहंकार उसे छोड़ना होगा ।वह हो चाहे सांस्कृतिक प्रतीक लेकिन सत्ता के मूल्य चेतना ,नैतिकता और सत्य के लिए उसे अपने साहस , गरिमा , और मर्यादा , सम्मान की अनदेखी नहीं करना चाहिए । निर्बल भयभीत बकरों को सत्ता च्युत कर साहस पराक्रम को पुनः: सत्ता पर स्थापित करना ही होगा । निर्बल बकरों की मिमियाहट से गूंजती यह सता की आवाज किसी एक दिन बदलेगी । बल ,बुध्दि, विवेक ,चेतना और न्याय की दहाड़ का साहस भरा स्वर ही शक्ति का पर्याय है । यही वास्तविक सत्ता भी है । शेर से सत्ता छीन कर बकरों का राज व्यवस्था का बहाल होना हमारी कमजोरी है ।सत्ता पर शेर ही शोभा देते हैं ।कमजोर नेतृत्व हमेशा लज्जा और शर्म का सबब होता है । शेर पराक्रम और संस्कृति का प्रतीक है और बकरा भय,निर्बलता, और चेतना शून्य सत्ता का प्रतीक है ।इन प्रतीकों को गहरे अर्थो में समझना ही बहुत महत्वपूर्ण है ।आज नेतृत्व की अगुवाई बकरों की प्रजाति के हाथों में है ।यह एक संकेत है बदलाव के बिन्दु का इसे समझें और अगुवाई करें ।
विनीता रघुवंशी
