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आकार लेती यात्राएं-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आकार लेती यात्राएं
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( ५ )
अपने पंजों और एड़ियों पर
हथेलियां फेरते हुए
उसे लगा कि —-
जाने कब से
कांटों का
एक जंगल ही समाया है उनमें — और
जूतों वालों के पांवों में
बिवाइयां तो दूर
मोजे तक नहीं फटते
*** *** ***
अब वह
अपनी हथेलियां गौर से देखता
जो सुर्ख हैं
बार – बार
ठुट्टे पंजों में
अंगूठों को हिलाता हुआ
अपनी ही आंतों को
तांत बना कर
जिस धनुष की
रचना पर सोचता
उसकी टंकारें
उसे साफ – साफ सुनाई दे रही हैं
*** *** ***
मिटेंगी
अवश्य मिटेंगी
ये बेडोल ऊंचाइयां और
गूंजेगा मुक्त राग
दूर – दूर उस पहाड़ी
रेत, मैदान ,और नदी तक
*** *** ***
वह बंधी मुट्ठी
भिंचे दांतों से
उनकी ओर
देख रहा
सुन रहा
अपनी तरफ आती हुई
करोंड़ों – करोड़ों पग ध्वनियां
और
गुन रहा
आदमी और आग के
शाश्वत संबंध
*** *** ***
अब सूर्योदय के
साथ ही उसे
सब कुछ
साफ – साफ नजर आने लगा —
आदमी और
आग
कभी ठण्डे नहीं होंगे
आदमी और आग – – – आदमी और आग !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कविता के भीतर से आदमी के संघर्ष की निरंतरता के बहुत से दृश्य उभरते हैं ।आकार लेती यात्राएं किसी एक वक्त की कथा या किस्सा नहीं है ।यह संघर्ष जमदग्नि और रेणूका के मध्य सूरज के झोले से पादुकाएं पाने के बाद शुरू होता है । जमदग्नि और उसके वंशज हमेशा सत्ता के साथ सामाजिक न्याय के लिए लड़ते रहे । युग बीते यह चेतना की लड़ाई हर युग में जारी रही ।आदमी अपनी इन यात्राओं में मानव जीवन को आकार देता रहा ।उसने इस सभ्यता और संस्कृति की यात्राओं में बहुत कुछ सीखा ,समझा और अपनी बौध्दिक चेतना का मज्जन किया ,प्रक्षालन किया और आविष्कार किये ।ऐसे भौतिक संसाधन बनाये कि दुनिया समीप आ गई ।उसने कल्पना ,जादू,तिलिस्म ,ब्रह्माण्ड के रहस्य उजागर किये ।वह समुद्र के तल में गया ,उसे पार करने के लिए डोंगी से लेकर जहाज तक बनाए ।उसने मानव जीवन के संरक्षण के लिए जंगल उगाये , पहाड़ और पर्वतों पर चढ़ना सीखा । नदियों के किनारों पर बस्तियां बसाई ।यह सब मनुष्य की ,आदमी की, अनवरत यात्राओं के ही नतीजे थे । यात्राओं के परिणाम से ही संसार की प्राप्ति हुई। ये संसार का ,सृष्टि का आकार मनुष्य को विस्मय, अचरज में डालने वाला था ।वह निरन्तर बुध्दि के द्वार खोलता गया और प्रकृति ने उसे अपने विकराल रुप , उदार रुप ,सुन्दर रुप , खाद्य पदार्थ से भरे भंडारों का रहस्य आदमी के सामने उलीच कर रख दिया ।इस तरह मनुष्य की यात्राओं में एक अपरूप ,अदृश्य सत्ता की शक्ति उभरी जिसमें सत्ता का एक रुप मालिक ,मुखिया ,शासक, नियंता बनकर तैयार हुआ और दूसरा रुप मेहनत कश ,श्रमजीवी, सर्वहारा ,नंगे पांव, नंगे बदन आदमी का दास रुप उभरा ।जिसका बौध्दिक स्तर मुखिया सत्ता से कमतर था उच्च बौध्दिक स्तर शासक चतुराई से सब कुछ हथियाता रहा और नंगे पांव आदमी की यात्राएं निष्फल रही । यह संसार और सृष्टि सदा नंगे पांव आदमी की ही अनथक यात्राओं के मुकाम है । संसार सृजन और मानव सभ्यता की शुरुआत तो नंगे पांव आदमी की ही श्रम चेतना का ही नतीजा है । यदि मनुष्य अपनी जिज्ञासाओं को लेकर गुफा से बाहर नहीं आता तो आज हम जिस सभ्यता और संस्कृति का अनुसरण ,अनुपालन और अनुकरण कर रहे हैं वह संभव नहीं होता । इसलिए कविता के पांचवे खण्ड में वह अपने पांवों और एड़ियों पर हथेलियां फेरते हुए महसूस करता है कि कांटों का एक जंगल ही समाया उनमें । यह नंगें पांव आदमी का अहसास है जो सत्ता में बैठे मनुष्य के पांवों की सुरक्षा करते जूतों के बारे में सोचता है ।यह सोचना उसकी संघर्ष यात्रा का ठहराव नहीं वरन यह उसका संकल्प भी है जहां उसे अपनी लड़ाई याने सामाजिक अन्याय के सामने न झुकने का हौंसला दे रहा है। वह अपनी आंतों की तांत बना कर धनुष की बनावट पर सोचता है ।उसकी टंकारें साफ सुनाई दे रही है ।युगों से मनुष्य की भूख को , क्षुधा को ही दासत्व के लिए इस्तेमाल किया गया आज आदमी अपनी उन्ही क्षुधा क्षुब्ध आंतों को औजार और आयुध के रुप में शोषक सत्ता के खिलाफ उपयोग करना चाहता है ।एक विश्वास भरा दृश्य कविता में उभरता है –” मिटेंगी ! अवश्य मिटेंगी !! ये बेडोल उंचाइया ! गूंजेगा मुक्त राग ” यह मुक्त राग क्या है ? समानता का राग ! सामाजिक न्याय का राग ! एक वर्ग हीन समाज ! गरीब और अमीर का भेद खतम करता समाज ? कविता में दृश्य बदलता है — करोड़ों – करोड़ों पग ध्वनियां सुनाई दे रही ।यह समाज का वैचारिक बदलाव है ।जहां वह समाज की असमानता के लिए चल पड़ी पग ध्वनियों की आवाज है । कविता का अन्तिम दृश्य है बार – बार दोहराया जाता संकल्प — ” आदमी और आग कभी ठण्डे नहीं होंगे !! यह आदमी के भीतर दबी संघर्ष चेतना की आग है जो कभी ठण्डी नहीं होगी ।यह मोनोलाग संसार की हर सभ्यता और संस्कृति में प्राणवंत रहेगा ।हर संस्कृति इसको दोहराती रहेगी ।आदमी अपनी यात्राओं को सृजन के आकार देता रहेगा ।आकार लेती रहेगी यात्राएं ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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