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आकार लेती यात्राएं
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( ४ )
जूते वाले लोग
अपनी तिकड़मों में
जाने कहां घूमघाम कर
अलस्सुबह तस्में खोलते तो
इनकी गैलरियों से
झरने लगती दुर्गंध
जिसे सूंघता हुआ
जन्म लेता दिन
शाम तक उसे
आते रहते झटके
उठती रहती पित्तियां
उगलता रहता
पूरा शहर घटनाएं
रेडियो से
महामहिमों की खरखराहट
टेलीविजन से
कुबेरों की —
प्रियदर्शिनियों की
खट्टी डकारें
पूरे माहौल पर छाई रहती
रात होते ही
हिंसा,बलात्कार ,कालाबाजारी
के रंगों में
रंगे रहते इनके मन
निर्माण के नाम पर
इनके जहन में
विध्वंसकों के अलावा
कुछ भी नहीं आता
इनके लिए रोटियां
कोई बड़ा मसला नहीं
इनकी मान्यता में
आबादी —
पेट भर जाने के बाद
गुर्राने लगती है
इसलिए रोटी को
कई – कई टुकड़ों में
बांटने की
आला से आला योजनाएं
इनके फितरती दिलों में आती है
ये वो होमा चिड़िया है
जो मांस तो मांस
हड्डियां तक — स्वाद से खाती हैं
सुबह होते ही
अखबारों में छपता कि
जो होना को
अपने माथे पर बिठा लेंगे
वे चुटकियों में
ग़रीबी की रेखा लांघ जायेंगे
यह सुनते ही
निकलते लोग
होता की खोज में और
थक कर लौट आते
तभी ये थके हाथों के पास
रोटियों के
टुकड़े लेकर जाते और
बदले में उनकी
अंगुलियां काट लाते
अंगूठे भर बचे रहते
ताकि वे —
खाता बहियो पर निशान और
बटनों को दबाने के काम आते रहे
नंगे पांवों और
कटी अंगुलियों वाले हाथों से वह
कल -कारखानों
कार्यालयों — दवाखानों में
काम करता
भुट्टे पंजों से
सिखाता
मदरसों में
बच्चो को गिनती
बोता खेतों में
पटवारी का नक्शा
हरी – भरी फसलों तक ही
उसका होता और
खलिहानों में
आते ही
बोरों में लद – लद कर
आला हाकिमों —
बैंकों — लेव्ही और
साहूकारों की
तोंदों में समा जाता – – – ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
जमदग्नि और रेणुका के संघर्ष से शुरु हुई यह यात्राएं अब वर्तमान के उस यथार्थ पर आकर एक नया मोड़ लेती है । जहां एक नई सभ्यता है ।एक नई संस्कृति का उदय है ।यह नई सभ्यता और नयी संस्कृति एक राजनीतिक व्यवहारिक जगत का निर्माण करती है ।एक ऐसे व्यवहार लोक का जहां सब कुछ तिकड़मों के हुनर से प्राप्त है । जहां सुरा – सुन्दरी- और दौलत के ठेके हैं । एक ऐसा भ्रष्ट आचरण जो समाज में दुर्गंध फैलाता है । जहां सात्विकता ,सदाचार , नैतिकता का गमन नहीं हो सकता ।यह सब दलाल संस्कृति की नई खोज है ।समाज की हर वस्तु बिकाऊ है यहां तक की पुरुष और स्त्री भी बिकाऊ है । इस सभ्यता में समाज में गरिमा किसी की भी नहीं बची ।न ममत्व बचा न मातृत्व न ईमान बचा न मूल्य बचे न वात्सल्य बचा । इस तरह वर्तमान में आधुनिकता का माहौल रचा – बसा है । हर मनुष्य पाने की दौड़ में शामिल हैं चाहे इस दौड़ में उसे कुछ भी छोड़ना पड़े ,कुछ भी खोना पड़े उस सब के लिए आज का मनुष्य तत्पर है ।आज का आदमी सृजन के नाम पर ध्वंस को रच रहा है ।घर से लेकर विश्व व्यवस्था तक वह केवल ध्वंस ,विध्वंस ही निर्माण कर रहा है ।उसकी सभ्यता , संस्कृति सब में नाश और महानाश के सपने भरे हैं ।वह आबाद नहीं बर्बाद होना चाहता है । उसके लिए इस समय रोजगार ,रोटी का मसला बड़ा नहीं है ।वह तो बस धर्म ,मजहब को बचाना चाहता है लेकिन जब मनुष्य ही नहीं बचेगा तो धर्म या मजहब का पालन ,अनुसरण कौन करेगा । इसलिए पहली जरुरत तो आदमी को बचाने की है ।हिंसा ,बलात्कार और कालाबाजारी से यदि मनुष्य बच पायेगा तब ही तो वह अपने ईमान ,धर्म ,मजहब, का पालन और रक्षा कर पायेगा ? यह विचारणीय विषय है ।इस पर समाज को गंभीरता से चिन्तन करना चाहिए ।आज पूरे विश्व में महाजनी सभ्यता का बोल बाला है जो मनुष्य का शोषण हर तरह से कर रही है ।रोजगार और आजीविका के साधनों को इस विश्व व्यवस्था ने शोषण और दबाव का जरिया बना लिया है । यह मनुष्य को रात – दिन के लिए दास,गुलाम, बना लेती है ।उसका भोजन ,आराम, सुख ,परिवार सब पर इस महाजनी सभ्यता का नियंत्रण है । आदमी इस व्यवस्था को स्वीकार करके मुक्त नहीं है ।यह व्यवस्था बताती है कि आदमी के परिवार में सदस्य कितने होंगे ।वह खेत में फसल कौन सी उगायेगा ,वह कौन सी खाद डालेगा और दवा कौन सी इस्तेमाल करेगा ? क्या यह आदमी की मुक्ति है ? होता चिड़िया एक महाजनी सभ्यता का प्रतीक है ।जो शोषण के सबसे खराब रुप को उजागर करती है ।वह चपेट में आये आदमी का मांस ही नहीं खाती वरन वह हड्डियां तक को खा जाती है । होमा चिड़िया की खोज में आज विश्व का प्रत्येक मनुष्य हलाकान – परेशान हैं । किसी को यह होता चिड़ियां नहीं मिलती लेकिन यह सबके दिलों और दिमाग पर छाई हुई है ।सब गरीबी रेखा से बाहर आना चाहते हैं लेकिन यह चमत्कारिक चिड़ियां का अस्तित्व हो तब न ? इस चिड़िया को पाने के लिए सब ठुट्टे हुए जा रहे ।यह ठुट्टापन ही तो गुलामी है । अंगूठे बचे हैं बटन दबाने के लिए ? चुनाव और चुनाव ? यह आधुनिक मनुष्य अपनी कटी अंगुलियों और ठुट्टे पंजों के साथ अपनी चेतना ,अपनी बुध्दि, अपनी संवेदना, अपनी विचार क्षमता ,अपना सत्य परखने की सामर्थ्य सब खो चुका और दासत्व स्वीकार कर खेतों – खलिहानों में , कार्यालयों,कल – कारखानों , दवाखानों, स्कूलों में गिन रहा बच्चो के साथ शोषण की गिनती ? हाकिम हैं और निगाह बानी के लिए आला अफसर भी हैं ।महाजनी का चाबुक चलाती बैंक व्यवस्था है ।धन्ना सेठ हैं ? शोषण से संघर्ष करते मनुष्य की बहुत सी यात्राएं हैं जो आकार ले रही हैं ।इन यात्राओं को करते हुए भी आदमी दासत्व के चक्रव्यूह में उलझता जाता है ।वह अपनी चेतना का इस्तेमाल नहीं करता वह आश्वासनों, सपनों, और भ्रमों के पीछे भागता है ।उसे अपने श्रम और बुध्दि का मेल बैठाना नहीं आता ? वह कल्पना और यथार्थ में फर्क नहीं करता ? जिस दिन कल्पना ,भ्रम और यथार्थ को समझ जायेगा उस दिन यह महाजनी विश्व व्यवस्था का तिलिस्म स्वत: टूट कर बिखर जायेगा ।
विनीता रघुवंशी
