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विनीता रघुवंशी
आकार लेती यात्राएं
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( ३/२ )
जादू टोनों के
कल्पना लोकों से हो कर
धर्म – दर्शन और मिथकों के
स्वप्न संसारों के
बीच से — दौड़ता —
भागता — हांफता
चील — गरुड़ — हंस और
कृत्रिम उपग्रह उड़ाता
आयुधों को बदल– बदल कर
पहले से अधिक
अपनी ही छानबीन में जुटा
इतिहास और प्रकृति का
अनूठा विस्मय
अपनी ही व्यवस्थाओं से जूझता हुआ
बढ़ता
तो पाता है कि —
हर पांच कदम पर चस्पा है
सरकारी हुकुम
हर बार नहा – धो कर नंगे
पांव निकलता
सरकार बनाने और
हर बार अपनी तर्जनी पर पाता
अमिट काली स्याही का दाग
गणराज्य और काली स्याही का
क्या संबंध है
सोचते – सोचते
जब वह थक कर सो रहा होता
तब उसका घर
निलाम कर दिया जाता
उस काले दाग के
कारकूनों द्वारा
उसे पहले ही
लग रहा था कि —
यह ‘ ‘सुभ ‘ नहीं है
गालियों का गणपति पुराण सुन
गली में खड़ी रोती है मेहरिया
वह आंखें फाड़ फाड़ कर
सरकार खोजना चाहता
किन्तु उसे —
वर्दीधारी सिपाही और
रुतबे से खड़े साहेब
नजर आते
कितने ही बूटों की रौंद
महसूसता वह अपनी पगड़ी पर
क्या इसी का नाम है —
सरकार —
आजादी !!
अब वह अपनी
पनहियां और पगड़ी फेंक
सरकार और आजादी से
रु – ब – रु होने के लिए
सड़क पर आ गया है
वह छब्बीस जनवरी से मिलने
ठेठ दिल्ली तक पैदल जाता
किन्तु यह देख
हैरत में हों जाता कि
वे भी बैण्ड बाजों के साथ
संगीनों से लैस
नाबदार जूतों की परेड और महामहिमों को
सलामियां देने में व्यस्त
वह अब–
अच्छी तरह समझ गया कि
पांवों के जूतों को
शट्ट से बजा कर
फुर्ती से
सलामी देने का नाम स्वाधीनता है
एक अजीब- सी
बदबू से भरे
इस समारोह के बीच से
अपनी नाक दाबे
लौट आता वह
कागज, कलम,केमरे वालों से
बचता हुआ —और
गांव आ कर
चकमक पत्थरों में दबी
चिनगारियों -सी
परचाने लगा इच्छाएं
वह अच्छी तरह
समझ गया कि —
आजादी और सरकार
अपनी ही रगड़ से
अपनी ही आग से
जाने जा सकते हैं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
मनुष्य की खोज यात्रा जादू की चकित कर देने वाली दुनिया से बाहर आई ।इसी तरह वह कल्पना के मनोहारी दृश्यों से मुक्त हो कर जब यथार्थ की दुनिया से परिचित हुआ तब उसने बहुत सारी मशीनों का ,भौतिक संसाधनों का आविष्कार किया ।वह संसार को अलग निगाह और नजरियों से देखने लगा ।उसकी आस्था में चमत्कार भी थे जिन्हें वह अजूबे समझता था और उसे लगता था कि यह सब अचानक और करिश्में की तरह उसकी जिन्दगी से जुड़ गये हैं ।कोई दैवीय शक्ति या अनहोनी अदृशय चमत्कार उसके जीवन को संसाधन से भर रही है ।इस तरह की अजनबी आस्था से जुड़ा हुआ वह फिर धर्म और दर्शन के मिथकों की पौराणिक कथाओं के ज़रिए अपने आसपास की दुनिया को समझने लगा । मनुष्य की इस यात्रा में उसकी आस्थाएं बार – बार अपना रुप बदलाव करती रही ।आदमी को कभी दुनिया जादू का करिश्मा लगी तो कभी कल्पना का मनोहारी चमत्कार लगी ।जब वह संसार पर भरोसा करने लगा तो उसमें धर्म ,ज्ञान, और दर्शन के प्रति जिज्ञासा बढ़ी और वह इन्हें आदमी के वजूद के साथ जोड़ कर देखने लगा । उसने मनुष्य को अनुशासित करने के लिए पुराण ,शास्त्र , उपनिषद और तंत्र – मंत्र की रचना की आदमी की बुध्दि इस अपने ही बनाये व्यवस्था – जाल में वह फंस गया है । वह अपनी यात्राओं के मुकाम पार करता हुआ ।आ पहुंचता है आजादी के बाद की व्यवस्थाओं के बीच जहां हर पांच कदम पर याने हर पांच बरस पर सरकारी हुकुम चस्पा हैं चुनाव के ।वह चुनता है । उसके लिए सरकार चुनना पवित्र कार्य है । इसमें उसके अधिकार के साथ आस्था भी जुड़ी है ।वह नहा – धोकर इस पवित्र काम को करता है ।अपनी तर्जनी पर उसे इसके बदले मिलता अमिट काली स्याही का दाग ।यह दाग उसके घर को निलाम करता है । उसे अपनी चुनी हुई सरकार कहीं नहीं दिखती ? दिखते हैं वर्दीधारी सिपाही और रुतबे वाले साहेब ? यह उसकी ही व्यवस्था से जूझता हुआ अनूठा विस्मय है उसके सामने ? गणराज्य और काली स्याही का संबंध ? गण ही तो रौंदा जा रहा है ।फिर उसकी आस्थाएं और चेतना दोनों आहत होती है ।वह लोकतंत्र का आशय जानने पहुंचता है देश की राजधानी दिल्ली जहां उसे समझ आता है स्वाधीनता का अर्थ ? यह अर्थ इतना बदसूरत और बदबू दार है कि वह नाक दबा कर समारोह से भागता है । जहां आजादी स्वयं कैद में है ।जनता वहां से नदारद है ।सरकार और उसके नुमांइदों ने जश्न को उससे छीन लिया है ।बहुत से बूटों की रौंद उसे अपनी पगड़ी पर महसूस होती ? वह मन ही मन सोचता कि इसी का नाम सरकार और आजादी है ? यह सवाल चेतना के बीच से उठा हुआ सवाल है ? सवाल के जवाब को खोजना हर नागरिक का फर्ज है । हर नागरिक को अपनी चुनी हुई सरकार को अपने सुख – दुख में , अपने आसपास खोजना ही पड़ेगा ।सरकार के कानों तक जनता का दुख ,कष्ट,पीड़ा पहुंच रही है या नहीं यह जानना तो जनता का हक ही है । इसीलिए सरकार और आजादी जानने के लिए आदमी को सड़क पर आना ही होगा ।आदमी को अपने भीतर दबी चेतना की आग को भी सुल्तानी होगी । जानना होगा ,जताना होगा उस आग की गरमी को भी ।आदमी को समझना होगा कि आजादी और सरकार अपनी ही रगड़ से ,अपनी ही आग से जाने जा सकते हैं । यह आग मामूली नहीं चेतना की आग है ।जब तक आग का अनुभव नहीं होगा तब तक सरकार और आजादी यों ही जाया होती रहेगी ।यह आदमी की चेतना की यात्रा है । इसलिए यह आकार लेती है उसके यथार्थ, जिज्ञासा,ज्ञान और कर्म से सत्य की निष्ठा पर दृढ़ रहकर । नागरिक की सत्य निष्ठा ही आजादी जैसे चमत्कार रचती है ।यही सबसे बड़ा विस्मय और अनूठापन भी है ।
