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आकार लेती यात्राएं
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धूप और धरती की
आंच से
भट्टे पड़े सख्त पांव
सफेद झक्क यात्रा के लिए
जाने कब से चल रहे हैं
हरी नसों के जाल- सी
मंजिलें
कितनी – कितनी बार उभरी हैं
उसकी पिण्डलियो में
कितने ही महाप्रलय देखें हैं इसने बट-पत्र पर बैठे
चूसते हुए पांवों के अंगूठे
या हिमालय की
खण्डी चट्टान की छांव में
उकड़ूं बैठे हुए
इसके पांवों को छूकर ही
उतरता आया
जल प्लावन का नशा
मुंह धो कर खड़ी होती रहीं वनस्पतियां
सागर की सेज पर
सोई धरती
अपने हरे – हरे कपड़ों को निचोड़ती
शर्मा कर बैठती आई है
जिसकी रेवड़ी से चांद और
मांग से बार – बार जन्में हैं नक्षत्र
स्वस्थ – मन से
देखता है आदि पुरुष
पूरब से उगता हुआ सूरज
जिसकी आंच में
तपाने लगता
दूर – दूर तक फैली सीलन
उलटता – पुलकता यादें
भाप से —-
उठने लगती सौंधी गंध
जिसे चीर कर
काफी दूर से — ईथर सी दमकती
झरनों- सी खिलखिलाती
फूले पलाशों वाली हंसी
भर लेती अपनी बांहों में
मस्त हो जाता वह
भूल जाता सारी यातनाएं और
गुफाओं को पार कर
मैदानों में
जन्मदाता हुआ अनेक सभ्यता – संस्कृतियां
गांवों – – कस्बों — नगरों — महानगरो को बसाता हुआ
चला आया नंगे पांव
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
यह मनुष्य की यात्राएं हैं । जिसमें आदमी हमेशा नंगे पांव ही चला है ।खोजते हुए सभ्यता और मानवीय संस्कृति के मूल्य पाते हुए ।वह धरती और धूप। को सहता है । हजारों हज़ारों प्राकृतिक विपदाओं का सामना करता है ।हर बार उसका अस्तित्व खतरों में डूबता और उभरता है ।कभी उसे सात ऋषि कन्याएं ,कभी अप्सराएं पालती – पोसती और नव कुमार बना कर यात्राओं पर भेजती हैं ।हरी नसों के जाल सी मंजिलें बिखरी हुई हैं ।यह बिम्ब भी एक दम नया है ।हरी जाल सी मंजिलें कितना अद्भुत और अनूठा प्रतीक उन मुकामों के लिए जिन्हें पाने के लिए मनुष्य निरंतर यात्राएं करता रहता है ।जो हर बार कोरे कच्चे सपने की तरह हरी हैं । पिण्डलियो की उभरी नसें जो यात्राएं करते हुए कड़क और सख्त हो चुकी हैं । मनुष्य सदा ही अपनी खोज , अपनी जिन्दगी बचाने और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए चलता रहता है ।आदमी के पैरों को छूकर ही जल प्लावन का महानिशा। उतरता रहा है ।आदमी की बुध्दि और आत्म बल ने हमेशा प्रकृति को नत शीश अवस्था में सहयोगी बनाया है । प्रकृति हर बार मनुष्य की यात्राओं की प्रसंग बन कर आती रही है । हरी वनस्पतियां मुंह धोकर आदमी की यात्राओं में सहचरी बनी है ।यह प्रकृति रुपी धरती सागर की सेज पर शयन करती है ।इसकी रेवड़ी से चांद जन्मता है और मांग से नक्षत्र जन्म लेते हैं । यह प्रकृति रुपी स्त्री ही इस सृष्टि की सर्जक है ।सूरज आदि पुरुष है जिसके जन्म का कोई लेखा – जोखा आदमी के पास नहीं है लेकिन आदमी की हर यात्रा का साक्षी है यह आदि पुरुष सूरज ।जिसका मन स्वस्थ हैं । सेहत का रहस्य ही है मन का स्वस्थ रहना । सूरज की ऊष्मा ही तो दूर दूर तक फैली नमी ,सीलन को सुखाती है ।सूरज ही तो प्रकृति के समस्त क्रिया – व्यापार को उलटता – पुलकता है ।यादों की भाप मन में उठती है । इन यादों में सौंधी गंध बसी होती है जो आत्मा और मन को निर्विकार कर देती है यह विकार विहीन होना ही तो मन की सेहत है ।यादें हमेशा मन को विकृति से रहित करती है । यात्राएं करता हुआ मनुष्य जब दमकती हंसी को पाता है तो वह अपनी यात्राओं की यातनाएं भूल जाता है । वह निर्मल प्यार पा कर रचने लगता है नयी नयी सभ्यताएं और संस्कृति के आबाद नगर गांव कस्बे बसाता आता है नंगे पांव । यह आदमी की यात्राओं का नतीजा ही है कि वह मानवीय सभ्यता और संस्कृति को रचता चलता है ।यह मनुष्य की वैचारिक यात्रा है जिसमें मानवीय मूल्यों की चमक है ।
विनीता रघुवंशी
