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विनीता रघुवंशी
कविता का सर्वनाम
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कविता रचते हुए नहीं होते
कोई आलोचकीय विकार
ना पाठ के वक्त —-
काव्य भक्षियो के ख्याल मन में
ना ही कविता पर बातें करते हुए आते
जेहन में ऐसे लोग
जो स्वर्ग नर्क का भय दिखाते
करवा देते पिण्डदान कविता का
अपुन तो कविता के भावलोक से
मैं की झण्डी उतार
हम के ध्वजारोहण में लीन हैंं
ताकि संदेशवाहिका की तरह
फहराती रहे आकाश तक पताका प्रेम की
और सर्जन सर्जक की
भूमिका निभाते हुए
अपने एक हाथ में शल्यक्रिया का चाकू
दूजे में मरहम पट्टी लिए
हर जगह घूमती रहे वह
उठाती रहे बेईमानी के खिलाफ
तीसरा हाथ
चौथा इंसानियत को थपकियां देने
और झंकृत होती रहे
ज्ञान -कर्म की अंगुलियों से आठों पहर
संवेदन की सितार उसकी
ताकि बाजारों में
गुम होने के बजाय
अपनी संज्ञा अपने सर्वनाम को
सार्थक करती
अनुभूतियों के खुले मैदान में
साफ -साफ दिखाई देती रहे कविता ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में साहित्य की सभी विधाओं ,लेखकों ,मनीषियों चिन्तकों पर एक महती जिम्मेदारी है समाज को सही सही दिशा देने की ।सबसे बड़ी जिम्मेदारी महसूस की जा रही है कविता के लोक-मंगल कारी धर्म पर यह धर्म केवल अकेली कविता का ही नहीं है वरन समग्र साहित्य -चेतना का है । कविता अकेले मनुष्य के वैयक्तिक अनुभूतियों और अनुभव का ही बयान भर नहीं होती ।ना तो वह अकेले आदमी की जय और ना ही अकेले मनुष्य की हार का खुला चिट्ठा ही है ।वह जब भी आदमी के पक्ष में खड़ी होती है तो वहां वह मैं का हाल बयान नहीं करती वरन वह समाज के सर्वजन का ,हम बनकर प्रस्तुत होती है ।कविता रचते हुए उसकी आलोचना या साहित्य पर रोक लगाने वाले वे सत्ताओं के राजधीशों का ही विचार उभरता है ।आज वर्तमान हालात भी साहित्य विरोधी हैं ।समाज को साहित्य की भाव-धाराओं से विमुख किया जा रहा है ।ऐसे घटिया और हल्के साहित्य को समाज हितैषी कहकर स्थापित ,प्रचारित,प्रसारित किया जा रहा है जिसकी वजह से समाज में नफरत ,हिंसा ,भय ,धर्मान्धता का माहौल रचा जा सके ।जब भी साहित्य आदमी के पक्ष में तन कर खड़ा होगा उस समय इस तरह के मामूली भय याने आलोचक और काव्य भक्षी माहौल सब बेमानी हो जायेंगे ।कविता पर से व्यक्तिवाद की झण्डी और वे तमाम प्रयोग खारिज किये जाने चाहिए जहां कविता केवल अकेले आदमी की पक्षधर बनकर उसके प्रेम ,त्याग ,भोग का अनुभव व्यक करने भर का जरिया बन जाये ।साहित्य याने कविता तो केवल और केवल मनुष्य और मनुष्य से लेकर समाज के हर उस प्राणी मात्र की हितैषी है जिनमें प्राणतत्व है जिनमें प्रेम का अविरल स्रोत है ।साहित्य और कविता का तात्विक भाव तो प्रेम की अनुभूति ही है । साहित्य का,कविता का यदि समाज में सृजन हो रहा है तो उसका मर्म और धर्म तो प्रेम ही है । यहां सर्जन शब्द दो मायने में प्रयुक्त हुआ है एक सर्जन शल्य चिकित्सक और दूसरा सृजन कर्ता यै दोनों ही मनुष्य के शरीर और समाज की वैचारिक देह के रोगों का उपचार करते हैं ।शल्य चिकित्सक तन के विकारों ,रोगों का निदान करता है और रचनाकार समाज में आये मनोरोगों की काट -छांट करता है फिर से समाज की जीवन स्थितियों को प्राण मय बनाता है ।समाज के मनोविकारों के निदान के लिए साहित्य की संवेदनशील धारा का होना बेहद जरूरी है ।साहित्य और कविता ही वह औषधि है जो समाज को प्राणवंत और चेतना युक्त बनाती है ।जो समाज पठन -पाठन से दूर चला जाता है वह निश्चित तौर पर अपने मृत होने का प्रमाण देने लगता है ।आज का समाज केवल उत्सव धर्मी बना प्रदर्शन प्रिय हो चुका है ।यह प्रदर्शन की वृत्ति यह प्रमाणित कर रही है कि समाज के पास केवल देह बची है आत्मा तो इसमें से निकल चुकी है ।साहित्य और कविता की निकटता ही समाज की आत्मा है । साहित्य वह देवता हैं जो चतुर्भुज है ।जिसके एक हाथ में शल्यक्रिया करने वाला चाकू है दूसरे में समाज के ज़ख्मों पर ,घावों पर , मरहम लगाने वाला हाथ भी सक्रिय हैं ।जो मनुष्य की पीड़ा का ,दर्द का शमन करता है ।उसके पास तीसरा हाथ भी है जो न्याय का रास्ता दिखाने के लिए उठता है ।समाज इस अन्याय के खिलाफ उठे हाथ का संकेत भी ग्रहण करता है साहित्य और कविता के माध्यम से ? कविता हर समय अन्याय और बेईमानी के विरोध में उठा हुआ हाथ होती है । यदि कविता को समाज से हटा दिया जाये तो समाज निष्प्राण हो जायेगा ।कविता का यहां व्यापक अर्थ ही है कविता याने साहित्य ही ।वह साहित्य जो लोक-मंगल की भावनाओं से सृजित किया गया है ।कविता का चौथा हाथ भी है जो मनुष्य को इंसानियत का पाठ सिखाता है । यह कविता का सहज सरल अनुप्रयोग है जो हर समय मनुष्यता के सितारे को झंकृत करती है । कविता के भीतर गहरी संवेदना की अवस्था होती है जो मनुष्य के जीवन का हिस्सा बनी रहती है ।साहित्य और कविता सत्ता के हाथों खरीदी और बेची जाती है ।कविता के दाम लगाये जाते हैं और पुरस्कार और ईनाम देकर कविता को सत्ता के पक्ष में खड़ा किया जाता है । पुरस्कार और ईनाम कविता को अपने सात्विक जिम्मेदारी से भटकाया जाता है ।कविता संवेदना की बुनावट छोड़ कर राजकीय जाल में उलझ जाती है ।ये साहित्य का चमकीला बाजार है जिसमें पुरस्कार की चकाचौंध और चेतना शून्य अमानवीय वृत्तियों का पक्षपोषण का हो हल्ला मचाया जाता है ।असल साहित्य और कविता की चेतना को केवल समाज की दरकार होती है ।जब भी साहित्य का , कविता का सृजन होता है तब तब ना तो आलोचक की दृष्टि ।ना बेसुध पाठक -श्रोता का विचार ।ना किसी हुक्मरान की वक्र निगाह या किसी साहित्यिक आडम्बर , व्यक्ति वाद , अस्तित्व वाद , मार्क्सवाद,गांधीवाद, प्रयोगवाद,ना प्रगतिवाद का ख्याल दिमाग में आता है ।कविता की सार्थकता तो इसी में है कि वह अपने विचारों को अनुभूतियों के साथ स्पष्ट व्यक कर सके ।साहित्य के चारों मकसद समाज के मनोविकारों का समाधान ,समाज की लोकव्यथा और संताप का शमन , अन्याय के विरोध में उठा हाथ बनकर और चौथा हाथ हो इंसानियत के पक्ष में यही तो है कविता की सार्थकता ।कविता का रचा जाना ,साहित्य का लोकधर्म ये सब है कविता का मर्म ।कविता या साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है समाज की चेतना का उन्नयन । खुदगर्जी और स्वार्थ के दायरे से बाहर मनुष्य की चेतना में परहित की चिन्ता और फिक्र का जागरण ।
