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धरती का मर्म कथन
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मेरी बेटियों !
तुम अकेली नहीं हो
आपस में बोलो बतियाओं जरा !
बोलने बतियाने से
जड़ता खतम होती है
देखो, यह सूरज
अकेला होकर भी
सभी से —
बड़ी गर्मजोशी से मिलता है
चांद
रात भर
खामोशी को फूलों की खिलन में
बदल कर
उनके माथों पर
चुम्बन धर देता है
तुम्हें कब तक
अपनी छाती से चिपकाए रखूं मैं
कब तक फिराती रहूं
तुम्हारे माथों पर हाथ ?
तुम्हें —-
इस हालत में देखकर
पूरा का पूरा
पठार
भय से
थर थराने लगा है
घास और पत्तियां तक
खामोश है
तुम्हारे बोलते ही
यह पूरा का पूरा
पठार उठ खड़ा हो जायेगा
और घास अंखुआ कर
गा उठेगी हरियाली का गीत
बोलो -बतियाओ
आपस में तुम
मेरी बेटियों !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में धरती ने आपस में संवाद बनाने के महत्व को इंगित किया है ।धरती पर धरती के आदमी के भीतर बैठे संताप ,दुख , अनुभूति, अहसास,सुख सब को आपस में व्यक्त करने से मन को शांति मिलती है ।अकेलापन खतम होता है ।एक -दूसरे के प्रति सहानुभूति ,प्रेम ,लगाव अपनापन सब बढ़ता है ।भय की मनोदशा में भी थोड़ी राहत मिलती है ।धरती की ये बेटियां कौन है जो भय से जड़ हो गई हैं ।जिन की खामोशी ने पठारों को चेतना हीन कर दिया ।ये धरती की बेटियां हैं इसकी चट्टानें ।यह चट्टानें भी प्रतीक हैं ।आदमी की दृढ़ता की दशा की ।जब वह हर संघर्ष में चट्टान की तरह सामना करने के लिए तन कर खड़ा होता है ।भय उसके मन को छू भी नही पाता । इसीलिए धरती अपनी बेटियों को आपस में बोलने बतियाने की ताकीद कर रही है ।बोलने बतियाने से आपस में संवाद करने से आपस में सहारा मिलता है ।तनाव कम होता है ।और चेतना को बल मिलता है । धरती के संताप की गहराई से आमना सामना करने की शक्ति मिलती है । आदमी जब परस्पर बात करता है तो एक दूसरे के अनुभव साझा होते हैं ।एक भावनात्मक और वैचारिक अवस्था की स्थितियां बनती है ।माहौल और हालात में बदलाव की मनोदशा और चेतना निर्मित होती है ।आदमी का आदमी से संवाद और बातचीत कायम रहनी चाहिए ।यह बातचीत ही आदमी के हालात विचार परिवर्तन का मार्ग खोलता है ।केवल खामोशी से हर हालात को सहन करते जाना एक सामान्य बात नहीं है ।बल्कि हर गुजरते माहौल को साझा करना ,आंख खोलकर निगाह रखना भी जरुरी है ।जब समाज के सभी लोग परस्पर खामोशी तोड़कर बातचीत का सिलसिला बनायेंगे तब ही हालात में बेहतर बदलाव आयेगा । चट्टानें अकेली नहीं हैं सूरज भी धरती पर अकेला है वह धरती के हर कण कण से हर आदमी से हर पेड़ -पौधे,घास तिनके तक से अपनी उष्मा और ऊर्जा के साथ मिलता है ।अपनी ताप से सबको उत्साह उमंग और जोश भर देता है ।चांद भी प्रकृति का और ब्रह्माण्ड का अकेला ग्रह है लेकिन जब वह उगता है तो धरती का तृण तृण पेड़ -पौधे उसकी छुअन भर से खिल जाते हैं । इसलिए ऐ! चट्टानों तुम धरती पर अकेली नहीं हो ।अपने ईमान और सच्चाई के लोक-व्यवहार से सम्पर्क करो ।यह सम्पर्क यह बातचीत यह संवाद ही तुम्हारी जड़ता स्थिरता और भय की मनो -व्यथा की यथास्थिति के घेरे को तोड़ेगा ।भय की दशा में डूबकर या दुख की घुटन में समाकर यदि आपस में अपनी व्यथा को साझा करना छोड़ दिया तो समाज की चेतना भी धीरे -धीरे मृत हो जायेगी । सामाजिक चेतना को प्राणवंत बनाये रखने के लिए जरुरी है आपस में संवाद की दशा बनाये रखना ।चुप्पी हर हमेशा समाज घातक होती है ।अक्सर चुप्पी विस्फोटक यथार्थ का असंतुलन पैदा करती है । लेकिन संवाद हमेशा बदलाव के विचार को जन्म देता है । बातचीत से बहुत से बन्द दरवाजे खिड़कियां और रास्ते खुल जाते हैं । चट्टानों के बोलते ही पठार जीवित हो उठेगा कितनी मोहक कल्पना है ।पठार अपनी चिन्ता ओं ,अपने कष्टों को,अपनी तकलीफों को ,अपनी कठिनाई,अपने दर्द को दबा कर जीवित रहे लेकिन जब समाज की चेतना रुपी चट्टानी बेटियां आपस में चेतना भरे संवाद और बातचीत स्थापित करेगी तब ही तो समूचे हालात बदलने की दशा में दिशा की खोज करेंगे ।चुप्पियों से समाधान की दिशा खो जाती है ।यह समझने में बहुत समय व्यतीत हो जाता है कि मुश्किल क्या है ? और समाधान के स्रोत या सिलसिले कहां से खुलेंगे ? सच है कब तक चट्टानों को अपना वजूद बताने में वक्त लगेगा ?कब तक ये धरती से चिपकी रहेंगी ।धरती की इन बौध्दिक चट्टानी बेटियों को अपने आपको साबित तो करना ही होगा ।हर बार जन की पीड़ा बढ़ने पर यह सवाल खड़ा होता है “को हरे जन की पीर ” अब जन को आपस में बातचीत करके अपनी पीड़ा हरण की स्थितियां पैदा करना होगी ।अब अवतार की अवधारणा बेमायने है ।यदि धरती की चेतना रुपी बेटियां ही खामोशी छोड़कर बतियाने लगे तो पीड़ा का कष्ट का हल भी चुटकी बजाते होने लगेगा ।
हरदा ब्लास्ट की मृतात्माओं को हरदा के निवासियों की ओर से सादर विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
विनीता रघुवंशी
