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अपनी हत्या का मनोरम दृश्य
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मैंने अहिंसा को उस वक्त
हिंसा करते देखा जब वह
अपने पक्ष में हाथ जोड़े शान्त भाव से
वोट मांग रही थी
जहां मतदाता
जाति धर्म स्थानीयता के नाम पर
उसे जीत का भरोसा दे रहे थे
जिसे देखता —-
मतदान केंद्र की सीमांकन रेखा के पास
उसी के हाथों अपनी हत्या का
मनोरम दृश्य देख रहा था मैं —-
क्यू में लगे मतदाता के साथ
लोक -कल्याण के मत कर्म में लगे
अधिकारियों ,सिपाहियों ,एजेन्टों और
जनप्रतिनिधियों के बीच ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” आंगन बुहारते वक्त” से उद्धृत )
आज की कविता वैचारिक कविता है ।इसमें सूक्ष्म संवेदन की पकड़ है ।यह कविता संकेत है विचार की मृत्यु का ,यह कविता संदेश है नागरिक चेतना के नष्ट होने का ।कविता उस आत्म बोध के भीतर से जगह बनाती हुई हमें उस सवाल के पास ले जाकर छोड़ देती है जहां से नागरिक बोध और नागरिक चेतना के बीज को खोजना है । संविधान ने हमें मौलिक अधिकार के रुप में मतदान का अधिकार दिया ।हम याने जनता को यह हक हासिल हुआ कि हम हमारी सत्ता का ,सरकार का, बहुमत का, शासन का ,जन प्रतिनिधि का चुनाव निष्पक्ष , स्वतंत्र,और निर्भय होकर कर सकें ।जनता चुनाव के समय अपने नागरिक -धर्म को,निडरता को सौप देती है जाति ,धर्म , सम्प्रदाय, शहर ,मोहल्ले काॅलोनी ,की पक्षधरता के हाथों में ।यह सौंपना ही तो नागरिक चेतना की हत्या है ।उस निर्भयता का ,उस स्वतंत्र भाव की हत्या है । जहां अहिंसा के हाथों हिंसा हो रही है ।सब कुछ शांत है लेकिन जो संवैधानिक पध्दति है उसमें जाति ,धर्म , सम्प्रदाय का ,स्थानीयता का भेद जब घुस गया तो जो नागरिक की निष्पक्षता है ।जो निर्भय चेतना है वह मारी गई है ।यह हत्या कहीं दर्ज नहीं है लेकिन जिस शांत भाव से नागरिक की चेतना को ,उसकी स्वतंत्रता को वोट मांग लेने के तरीके से खत्म किया जाता है वह गौर करने लायक है ।ध्यान देने और विचार करने के काबिल है ।क्या सचमुच नागरिक अपने मताधिकार का निडर होकर ,निष्पक्ष होकर प्रयोग कर रहा है ।यह प्रश्न विचारणीय है ? हर चुनाव नागरिक की हत्या का एक भरपूर मनोरम दृश्य ही है । जहां पूरा सरकारी अमला तैनात हैं इस अनुपम हत्या के दृश्य -निर्माण में शासन स्वयं मत केन्द्र पर उपस्थित हैं ,कानून की देख- रेख
में यह नागरिक चेतना पूरे अहिंसक माहौल में सरेआम मारी जा रही है और नागरिक का आत्म बोध जाग नहीं रहा ? यह भी अजीब स्थिति है ? संविधान की सहमति से चुनाव का खेल जारी है और उसमें जाति के नाम पर वोट मांगने पर किसी को कोई उज्र नहीं है ,धर्म के नाम पर न्याय की बलि दी जा रही है इसमें भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है , अपने वतन का ,अपने इलाके का ,अपने क्षेत्र का उम्मीदवार है इस पर वोट का ठप्पा लगाते हाथों को कोई एतराज़ नहीं है ? क्या हम वास्तव में बेहद अहिंसक तरीके से एक संवैधानिक नागरिक अधिकार की हत्या का दृश्य इस लोकतंत्र के महापर्व को मनाते हुए नहीं रचते ? यह एक विचारणीय तथ्य है जिस पर हर नागरिक को गहराई से विचार -विमर्श करना चाहिए ।हर मतदाता हर चुनाव में अपनी हत्या स्वयं करता है ।यह दृश्य आम है बिना असहमति के ? हर नागरिक अपने नागरिक बोध का हत्यारा है बिल्कुल अहिंसक माहौल में रचा – बसा । हर चुनाव में मौजूद हैं अफसर ,सिपाही , एजेंट,और जन प्रतिनिधि और उन्हीं के बीच मारा जाता है एक नागरिक ,एक चेतना ,एक विचार ,एक मौलिक अधिकार,एक हक , एक नागरिक बोध की हत्या का दृश्य हर आम चुनाव में दोहराया जाता है क्योंकि यह बेहद मनोरम है ।बेहद मन मोहक है ।यह दृश्य मनोरंजक है ।सारी उदासी के पौंछने का भरोसा होते हुए भी केवल चेहरे बदलते हैं उदासी वैसी ही बरकरार रहती है । मंहगाई , अर्थ-व्यवस्था, शिक्षा , समाज सब यथावत रहते हैं क्योंकि नागरिक मर गया है ।वे नक्शे नजरों से ओझल हैं जिनके बल बूते अपने शहर नगर गांव की बेहतरी का सपना संजोया जा सके ।क्या वे सपने नागरिक की खुली आंखों में दिखाई देंगे जिनसे जन प्रतिनिधि की योग्यता की परख हो सके ।अगले चुनाव यह भरोसा भी दें कि अब नागरिक का आत्मबोध कलम नहीं किया जा सकेगा ? सचमुच हर चुनाव हमें मारता है ।अब उस चेतना की जरुरत है जिसमें नागरिक खुद ब खुद अपने जीवित होने का प्रमाण दें न जाति ना धर्म ना झूठी राष्ट्र भक्ति का पाखंड ही कारगर बने ।जनता के प्रति समर्पित जन प्रतिनिधि ही सच्चे लोकतंत्र के , नागरिक चेतना के , संविधान के संरक्षक हो सकते हैं बाकी सब लोकतंत्र का झोल है ।जनता बस ताम -झाम है सजावट का सामान है ।यह तो जनता को ही तय करना है कि वह निर्जीव सामान है या चेतनावान नागरिक ?
विनीता रघुवंशी
