Home आज की कवितापत्थर-पहाड़ों के बीच

पत्थर-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
पत्थर
******
पत्थर को
जड़ समझने के पहले
यह जानना भी जरुरी है
कि — कितना कितना चेतन है वह!!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता बहुत छोटी है पर मर्म से भरी हुई ।हर आदमी अपने सीमित भावबोध और औसत जिन्दगी के साथ जीता हुआ जड़ ही है । जिस तरह पत्थर भी अपने तराशे जाने से पहले ठोस ,आकृति विहीन और भाव बोध की अभिव्यक्ति में जड़ ही होता है ।उसी तरह आदमी भी अपनी प्रकृति में ठोस जड़ और भाव बोध की सीमित अवस्था में जड़ ही होता है ।आदमी को तराशा जाता है शिक्षा के द्वारा ,संस्कार द्वारा , आचार -विचार द्वारा ,लोक रीति,नीति और मानवीय चेतना दृष्टि से सम्पन्न किया जाता है ।जिस तरह पत्थर के ठोस वजूद में मूर्ति का आकार छुपा होता है और तराशे जाने पर मूर्ति अपने भाव का बोध मुख मण्डल की छवि से प्रगट कर देती है ।इसी तरह मनुष्य भी संगत ,संस्कार ,अभ्यास ,सीख ,लालन -पालन के परिवेश और परिजनों से धीरे धीरे मन पर पड़ती भाव धाराओं ,धारणाओं को आत्म सात करता जाता है ।यह आत्म सात करने की क्षमता ही उसके अपने आत्म रुप को गढ़ती है ।यही उसका चेतन व्यक्तित्व निर्मित करती है ।एक आदमी अपने भीतर ना जाने कितने व्यक्तित्वों को समेट कर अपने आप को प्रस्तुत करता है ।यह वैचारिक ग्रहण -मुक्ति की दशा ही चेतना का सृजन करती है ।शिक्षा -दीक्षा की पध्दति आदमी में बाहरी बदलाव करती है जबकि आन्तरिक बदलाव सामाजिक लोकाचार ,रीति -नीति और लोक आचरण , वैचारिक धारणाएं करती हैं। इसलिए ही सचेत किया गया है कि — पत्थर को जड़ समझने से पहले उसकी चेतना के स्रोत को समझना भी बेहद जरुरी होता है ।वह निरा जड़ नही है । उसके परिवेश गत संस्कार मन में बैठी धारणाएं ,आस्थाएं सब उसका निर्माण करती है । पत्थर जड़ दिखता है उसी तरह आदमी अपनी सादगी ,अपनी सरलता सहजता के कारणों से जड़ या मूर्ख समझा जा सकता है लेकिन परिस्थितियों के साथ संघर्ष चेतना का जो स्फुरण पूर्ण शक्ति के साथ जब तनकर दृढ़ता से धरातल पर प्रकट होता है उसका अनुमान बाहरी तौर पर नहीं लगाया जा सकता। जिस तरह मूर्ति के निर्माण से पूर्व छवि के सौन्दर्य का अन्दाज नही लगाया जा सकता है ।चेतना और विचार आदमी की ठोस पहचान होती है ।विचारहीन मनुष्य पशुवत होता है ।उसकी चेतना पराये – बोध और समझ पर टिकी होती है । इसलिए किसी आदमी को पत्थर की माफिक जड़ समझना भी निरी मूर्खता ही है ।आदमी के आन्तरिक बदलाव ही उसकी चेतना के भाव बोध का प्रमाण है । बाह्य बदलाव उतने कारगर और लाभप्रद नहीं होते जितनी
की मनुष्य के आन्तरिक बदलाव से समाज , राष्ट्र और व्यक्ति की पारस्परिक चेतना का बदलाव होता है। चेतना के स्फुरण की ही जरुरत होती है हर वक्त ।पत्थर कविता में आदमी के प्रतीक रुप में प्रयुक्त हुआ है ।रचनाकार खुद ब़ंजर पहाड़ी इलाके में निवास करते हुए क्षेत्र विशेष से ही उपमा ,प्रतीक ,रुपक चुन चुन कर अपनी रचना धर्मिता को ऊर्जावान बनाये रखता है यह भी विचारणीय है और रेखांकित करने लायक है ।
🙏हरदा के बलास्ट में अपने प्राण गंवाने वाले अनाम दिवंगतों को मेरी शत -शत विनम्र श्रद्धांजलि
🙏विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More