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मैं ही रहा
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बिलोया गया लोक मथानी में
मक्खन की तरह झाग झाग
पकाया गया संस्कृति की आंच में
घृत होने तक
उगाया गया सभ्यता के खेत में
तिल जौ की फसल की तरह
होता रहा इतिहास की वेदी पर
मेरा ही हवन
मैं ही रहा सृष्टि के गर्भ से जन्मते
छंद की तरह सदैव
अरण्यों के कंठों से फूटती
ऋचाओं की तरंगों पर झूलता
मैं ही रहा वह अखंड गान —
जो बर्फ और आग और भाप की
धुनें भरता है जल थल नभ में
दिक्काल की तरह !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ मंजती धुलती पतीली ” से उद्धृत )
आज की कविता गीता में कृष्ण के आत्म ज्ञान की उस वैचारिक पृष्ठभूमि और दर्शन का वह तत्व ज्ञान है जहां हर बार यदि कोई अजमाया गया है तो वह मनुष्य और मनुष्य की आत्म चेतना ही है ।”मैं ही रहा ” कहकर यदि चिंतन की शुरुआत होती है तो वह प्रबल ,प्रखर,और प्रवीण आत्म तत्व ही है जो हर समय हर काल में हर अवस्था में सत्य की कसौटी पर कसा जाता है ,परखा जाता है ,स्वर्ण से कुन्दन बनाया जाता है । यह वह प्रक्रिया है जहां मंथन मनुष्य का ही होता है । मनुष्य की संवेदना ही हर बार और हर समय लोक वेदना की चिंतन धारा में मोम से भी कोमल होकर जब प्रगट होती है तब वह कुछ और नही वरन वह करुणा की तरल अनुभूति ही है जो अश्रु बनकर तत्पर होती है लोक चिंतन बनकर समाज के सामने । मनुष्य की चेतना ही वह संस्कृति है जो लोक वेदना का उत्ताप सहन करती है और उस तपन का मर्म ही है संस्कार ,लोक संस्कार ।वह मनुष्य का आत्म रुप ही है जिसकी फसल तैयार की जाती है ।यह फसल है पीढ़ियों की जिसे सभ्यता अपने संवर्ध्दन के लिए ,अपने फैलाव और प्रसार के लिए ,अपनी मनुष्यता के भाव जगत के लिए ,नस्ल संरक्षण के लिए , निरंतर बीजारोपण करती है ।उगाती है ।
यह मनुष्य के हित में किया जाता कार्य भी मनुष्य की आत्म चेतना और सामाजिक चेतना का ही प्रतिफल है ।जो हर सामाजिक प्राणी मात्र का जीवन दायित्व है ।हर प्राणी पृथ्वी लोक की इसी सभ्यता का परिणाम है । जब जब मानव इतिहास की रचना की जाती रही ,मानव हित के अन्वेषण,शोध,खोज , आविष्कार,प्रयोग होते रहे तब तब मनुष्य को ही हवन की सामग्री के रुप में इस्तेमाल किया गया ।यदि कहीं मनुष्य से जुड़े इतिहास की रचना हुई तो वहां सबसे पहले मनुष्य को ही हविष्य बनाया गया । सृष्टि के गर्भ से सबसे पहले जो छंद फूटा वह मनुष्य ही था वहीं से सृष्टि का प्रारंभ हुआ । बिना मनुष्य के सृष्टि की कल्पना ही संभव नहीं ।सृष्टि के समग्र संचालन, ध्वंस संहार और सृजन में केवल और केवल मनुष्य का चेतन आत्म तत्व ही रहता है । हर अवस्था हर दशा हर स्थिति में यदि कुछ सक्रिय हैं तो वह मनुष्य की चेतना , संवेदना ,करुणा अहिंसा ,सत्य, त्याग ही होता है । वेदों की अरण्यो की ऋचाओं में मनुष्य ही तो भाव तरंग लिए उपस्थित हैं ।वह चेतन तत्व और कोई नहीं वह मनुष्य की ही चेतना है जो जल में स्थित है जो जल में अवस्थित है और जो नभ में ब्रह्माण्ड स्वरुप में प्रगट है ।समग्र ब्रह्माण्ड ,समूचे भू मंडल में जो चेतन रुप है वह केवल और केवल मनुष्य ही है ।हर दिशा और हर काल ,हर समय में यदि कुछ केन्द्र में स्थापित है तो वह मनुष्य ही है । मनुष्य ही धुरी है । इस संसार का चेतन संवेदन और करुणा मयी शक्ति यदि कहीं प्रतिष्ठित है तो वह मनुष्य में ही है । मनुष्य ही वह मूल है जिसकै आस-पास धरती ,तारे,नक्षत्र चांद सूरज वायु आग और जल अपने अर्थ ,अपने रहस्य ,अपने स्वरुप को स्वत: उजागर कर देते हैं ।वही मनुष्य शक्ति की खोज बाह्य भूमंडल में ,बाह्य ब्रह्माण्ड में खोजता रहता है ।यह आत्मबल तो मनुष्य को अपनी चेतना के गह्वरों में खोजना चाहिए ।स्वयं की तलाश ही कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि है । हर समय मनुष्य समय से परे कभी नहीं रहा ।समय मनुष्य के आसपास ही मौजूद रहा ।यह मनुष्य और मनुष्यता की सबसे बड़ी ताकत है ।
विनीता रघुवंशी
