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ब्याज पर
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नींद से
कई -कई रातें
कई -कई दिन
कर्ज पर लेकर
वह भर भर खर्रार्टे
सोता रहा
और बढ़ता रहा
मिश्रधन का ब्याज उस पर
अब —-
न तो कर्ज चुकाने
उसके पास जागरण बचा
ना सपने
ना वक्त ना रात -दिन
जो मूलधन ही चुकाने में
साथ दें उसका ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता में कबीर के एक दोहे की अन्तर ध्वनि सुनी जा सकती है–” काल करे सो आज कर ,आज करे सो अब ।
पल में परलय होगी ,बहुरी करेगो कब ।
बात चेतना की है ।यह कविता आत्म चेतना की तलाश की कविता है ।आदमी जब जन्म लेता है तो उसके जन्म लेने का भी कोई मतलब कोई आशय होता है ।वह धरती पर इस हेतु ही नहीं जन्मता की वह पेट भरेगा ,धन अर्जित करेगा, परिवार का निर्माण ,पालन -पोषण ,संवर्ध्दन करेगा और फिर पके पात सा दुनिया से रुखसत हो जायेगा ।यह आदमी का ना तो हेतु है ना उसकी सामाजिक पहल है ।ना ही सामाजिक उपस्थिति ही है ।वह भरपेट भोजन और भरपेट अर्थात बेफिक्र नींद का भोग करे तो क्या यह उसकी सामाजिक भूमिका है । मनुष्य की यह भूमिका यह क्रियाशीलता या केवल अपने आपके घेरे में जीने की जो अवस्था है वह निष्क्रिय भूमिका है । मनुष्य का जीवन समाज का दिया गया कर्ज है ।यदि आदमी इसको केवल नींद ,भोग, में ही गुज़ार देगा तो समाज का कर्ज उस पर बढ़ता जायेगा । मनुष्य जीवन का सही उपयोग तो उसके सामाजिक उन्नयन में होना चाहिए ।आदमी है तो उसे अपनी वैचारिक सोच समाज के सही दिशा गमन के लिए करना चाहिए ।समाज के प्रति यदि चेतना धूमिल होती है ।समाज यदि मर्यादा की लकीर पार कर रहा है ।नफरत बढ़ रही है और प्रेम घट रहा है तो यह भी समाज में रहते हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है ।यदि राष्ट्र में कहीं नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो यह भी राष्ट्र में निवास करते लोगों की ही जिम्मेदारी है ।सुषुप्ति भी दो प्रकार की होती है ।एक सुषुप्ति है प्राकृतिक , स्वाभाविक, देह जन्य , दूसरी सुषुप्ति चेतना की होती है ,विवेककी होती है , विचार शून्यता की होती है ।अधिकतर मनुष्य इस दूसरे प्रकार की सुषुप्ति की अवस्था में ही अपनी उम्र ,अपना जीवन सब गंवा देता है ।वह जीवन का लक्ष्य तलाशता रहता है और इस तलाश में उसके मानस में बहुत सारी निरर्थकता बस जाती है ।वह अपनी निरर्थकता को या कहें कि अपनी रिक्तता को भरने के लिए बहुत सारे उपक्रम करने लगता है जैसे आज कल नेट सर्चिंग है ,गेमिंग है ,पूजा -पाठ,के बहुत सारे पाखंड है ।अपना मूल काम ,अपना मूल दायित्व निर्वहन करने की बजाय यहां – वहां के काम -धंधों में व्यस्त रख लेना ।जब जीवन का उतार अर्थात बुढ़ापा आने लगता है , प्रौढ़ता आने लगती है तब मन में विचार आता है कि अरे ! मैंने तो सारी उम्र यों ही बिता दी और कोई सार्थक विचार तो रचा ही नहीं ।ना पीढ़ियों को जीवन के सही अनुभव ही बांटें ,ना उनके लिए सपने ही रचे ।ना ही मेरे होने से शिक्षा के सही मापदण्ड ही रचे ।ना समाज ही सेहत मंद हुआ ।ये सारा जीवन केवल आजीविका के शोधन , धन-संपत्ति के संग्रह में ही ,स्वार्थ और खुदगर्जी में ही गुजर गया लेकिन तब तक बहुत सारा समय हाथ से निकल जाता है उस समय जागने से कोई लाभ नहीं ,कोई फायदा नहीं ।समय का मूल्य तो उसका सही उपयोग करने में ही होता है अन्यथा जीवन तो सभी को मिलता है प्राणी मात्र जीवन व्यतीत करता है लेकिन मनुष्य ही वह प्राणी है जो चेतना शील होता है ,, विचारशील होता है ,विवेकवान होता है पर वैचारिक जीवन का सृजन और चेतना किसी किसी के हिस्से आती है ।बाकी तो तलाश में किये सफ़र करने में ही जीवन गुजार देते हैं । जो मनुष्य चेतना पूर्ण वैचारिक जीवन व्यतीत करता है उसके पास पश्चाताप और पछतावा नही होता ।तब कबीर की तरह पूछना नहीं पड़ेगा “बहुरि करेगो कब ” वह कौन सा समय होगा जब कल – कल पर टाले गये काम पूरे किये जा सकेंगे । इसलिए यदि दान करना है तो अभी कर लीजिए ,यदि तप करना है तो अभी कर लीजिए ,यदि दया करना है ,क्षमा करना है तो, यात्रा करना है ,या ज्ञान पाना है तो ,शिक्षा लेना या देना है तो , कर्ज -मर्ज से मुक्त होना है तो तुरंत कर लीजिए ,यदि मानव मात्र और प्राणीमात्र से प्रेम करना है तो ,ममत्व और वात्सल्य करना है तो सब अभी कर लीजिए अन्यथा मिश्रधन बढ़ जायेगा जिसे चुकाने के लिए समय नहीं बचेगा ।यह जीवन कर्ज में मिला है जिसकी किश्त हम नित्य अपनी कर्मशीलता से अदा करते रहते हैं ।वैसे भी हर आदमी पर चार प्रकार के ऋण तो रहते ही हैं एक पितृ ऋण, एक पुत्र ऋण, एक पूर्वजो का ऋण, और चौथा ऋण होता है मोक्ष ऋण ।यह है समाज से मुक्त होने का। ऋण ,धर्म अर्थात मानव धर्म का ऋण । मनुष्य अपनी सारी उम्र केवल इसी ऋण को अनदेखा करता है ।जबकि एक मनुष्य जब से जन्म लेता है तब से समाज के द्वारा ही पाला पोसा जाता है । लेकिन वह उपेक्षा भी इसी ऋण की करता है । मनुष्य को अपने समग्र जीवन में शिक्षा , स्वास्थ्य,राजनीति ,अर्थ नीति ,धर्म नीति,समाज नीति अध्यात्म चिंतन को समाज हित और लोक मंगल की भावना से दिशा देना चाहिए ।यही मानव धर्म है । समाजिक न्याय की दिशा की अनदेखी ही समय की सबसे बड़ी चूक है ।यह चूकना ही समाज के कर्ज दार हो जाना है ।समाज भटक गया तो राष्ट्र भी भटक गया ।
विनीता रघुवंशी
