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घर बाहर
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पप्पू ने
दरवाजों के पर्दों पर
जो घुंघरु टांक दिये थे
उन्हें हवा
पांवों में बांधें
घर -घर नाच रही है
बाहर
निगाहों की हद तक
एक पूरा का पूरा जंगल
खिलखिला रहा है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता बहुत गहरे बोध की कविता है ।आदमी की बहुत छोटी सी हरकत या कहें तो चाहत किस तरह समाज में तमाशाई फितरत को रच देती है ।एक मासूम बच्चे की एक छोटी चाह की पर्दों में घुंघरु लटका दिए जायें ।उनकी रुनझुन से जो सुर ताल और लय का मध्यम स्वर उभरेगा तो वह कर्ण प्रिय होगा ।मन को सुकून देगा । लेकिन पर्दों में लटके घुंघरु की रुनझुन ने जो समाज में संदेश बांटा वह बहुत ही बारीक मनोभाव को जानने का सिलसिला बन गया ।समाज केवल अपनी मनोरम कल्पना में स्त्री के पैरों में बंधें घुंघरुओं की झनक से परिचित हैं ।उसके लिए घुंघरु चाहे पर्दों में लटकाये जायें वह तो उन्हें पैरों की झनक में ही महसूस करता है । इसीलिए घर से उठती घुंघरुओं की झनकार पर घर के बाहर से गुजरते राह- गुजर मुजरों का अनुमान और साज सारंगी महफ़िल की रुमानियत में बहकने लगे ।ताक -झांक करने लगे । यह समाज का मनोविज्ञान है ।यह समाज का बोध है। जो मासूम सी चाहत को एक भरपूर तमाशे में बदल डालने को उतावला है ।समाज को स्त्री हमेशा तमाशा बनी ही भाती भी है ? समाज या तो स्त्री को एक तमाशा ही समझता है । इसीलिए उसके पैरों में बंधें घुंघरुओं की झनकार उन्हें नाचती हुई सी स्त्री का अहसास कराती है ।स्त्री के अंग -प्रत्यंग पर तो तिरछी नजर और कटीले तंज भरी नजर डाली ही जाती है । लेकिन उसके पैरों में बंधें घुंघरु उसकी चेतना का स्वरुप बदल देती है ।स्त्री का सबसे गरिमा पूर्ण रुप मां का होता है ।इस रुप की प्रतिष्ठा से उसे कोई अलग नहीं कर सकता खुद स्त्री भी ? लेकिन आज स्त्री बाजार के इशारों पर अपनी अस्मिता को ,अपनी गरिमा को खुद खतम कर रही है ।आज के बाजार ने यदि सबसे ज्यादा खतरा खड़ा किया है तो वह स्त्री के सामने खड़ा किया है ।जब पप्पू याने घर के छोटे से बच्चे की मासूम सी हरकत पर्दों में घुंघरु टांक देने भर से घर में महफिल और मुजरों की शंका,आशंका,संभावना,और घर की महिला को बाजारु बनाकर बाजार के दरम्यान खड़ा कर सकता है जहां सिर्फ जंगल है ? यह जंगल प्रतीक है समाज के उस हल्के स्तर के मनोविकृति का जो स्त्री को भोग की सामग्री से अधिक कुछ नहीं मानता । इसलिए समाज के उस बोध और चेतना को जागृत किया जाना चाहिए जहां स्त्री की स्वतंत्रता और स्वछंदता के बीच एक भेदक रेखा जरुर खींची जानी जरुरी है ? स्प्री का मर्यादा खोता श्रृंगार और पुरुष के समानांतर अपनी जगह बनाती स्त्री सदा सर्वदा के लिए मर्यादाओं से मुक्त नहीं हो जाती ? जिस तरह पर स्त्री गमन पुरुष के लिए हेय है वैसे ही स्त्री का पर -पुरुष गमन भी हेय ही है किन्तु आज आधुनिकता और फैशन के नाम पर स्त्री और पुरुष जिस जंगल ,जिस असभ्य,जिस मर्यादा का आचरण कर रहे हैं वह चिन्तनीय है ? यह उस मासूम इच्छा का व्यापक अहसास तो नहीं , जहां हवा अफवाह बनकर घरों को कोठों में तब्दील कर डाल रही है । यह जंगल का खिल खिलाना वह अहसास तो नहीं है जो गुप्त संकेतो में कहे गये संवाद बोध को जता रहे हैं ? यह कविता केवल स्त्री के तमाशे में बदल जाने के बोध की ही कविता नहीं है ।यह उस पुरुष मानसिकता का भी बोध कराती है जो स्त्री के वजूद को किस हैवानियत भरे दृष्टिकोण से निरखती -परखती है ? स्त्री का वजूद केवल मां ,बहन ,बेटी के बरअक्स ही नहीं वरन उसके वजूद को केवल भोगमय वस्तु से ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती ।स्वयं स्त्री को भी अपनी चेतना में बदलाव करना होगा ।स्त्री को भी अपने आप को सजावट की दुकान या श्रृंगार का स्टेच्यू बनाकर पेश ना करें ।वह बुध्दिमति और शक्ति स्वरुपा है ।वह सौन्दर्य की स्वमिनी है लेकिन सात्विक रुप ही मनोरम है । यह सात्विकता केवल भाव की ही नहीं मनकी भी हो और रुप की भी हो तब ही स्त्री अपने गरिमामय अस्तित्व को स्थापित और प्रतिष्ठित कर सकेगी ।अन्यथा मासूम से बच्चे की हरकत भी जंगल को खिलखिलाने का मौका दे देगा ।अब स्त्री को अपने वजूद ,अपनी अस्मिता और अस्तित्व के मायने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ? क्या यह संभव है ? बुध्दि और दृष्टि की चेतना बदलने से यह संभव है ।
विनीता रघुवंशी
