आंगन
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( ७ )
चाहे जिस गांव – कस्बे – शहर
देश का हो
आंगन : भूगोल नहीं होता
जहां कहीं मर रहा होता
कोई आंगन
धीरे – धीरे तमाम रिश्ते
तोड़ देते दम ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आंगन का गहरा आशय है आत्मीयता ,अपनापन । आंगन है तो न जाने कब अनजाने लोग अपनापे और दिल के भीतर अपनी जगह बना लेते हैं ।अनजान और अजनबी भी वह भरोसा जीत लेते हैं जो कोई सगा संबंधी या रक्त बंधन से बंधें व्यक्ति पर होता है ।जब भी मकान के उस खुले हिस्से को जो आंगन की तरह इस्तेमाल हो रहा होता है उसे तोड़कर मकान में मिला लिया जाता है वहां से सबसे पहले अपनापन चला जाता है ।वह खुलेपन से गले लगाने का भाव विलुप्त होता है जिसके भरोसे अजनबी और अनजान भी घर – मकान में अपनी आवाजाही दर्ज कराते हैं । वहां वह स्नेह सिक्त माहौल होता है जिसमें लिपट कर गले लगाया जाता है । चेहरे पर खुशी की उमंग – तरंग फैल जाती है और दुख के अहसास दब जाते हैं । गिला – शिकवा विस्मृत हो जाते हैं ।आंगन का मतलब ही है बेरोक – टोंक आत्मीयता ,अपनापन ,भरोसा , विश्वास ।आंगन का मतलब होता है जिस पर किसी दस्तावेज में दर्ज न तो हलफ होता है न वसीयत न धरोहर न नामा न विरासत के नुमाइंदे की हक- उदूली यह तो सब का साझा वह स्थान हैं जहां सब आ जा सकते हैं ,सब बैठ कर गप्प ,बतकही, किस्सागोई ,बातचीत ,संवाद फेंका फेंक सब का साझा अभिव्यक्ति केंद्र ।यहां किसी की नकल उतारी जाती है तो किसी के चाल चलन पर सवाल उठाये जाते हैं बेरोक टिप्पणी । आंगन सबका साझा हिस्सा होता है ।यह भूगोल का टुकड़ा नहीं यह सामाजिक सम्पर्क की वह बारगाह होती है जहां औपचारिक से ज्यादा अनौपचारिक और मुंह बोले रिश्तों की मिठास घुली रहती है ।सब मन माने की बात ,नाते रिश्ते ,पुर सुकून मित्रता ,भाई – बन्दी , बहनापा ,ननद – भौजाई की नोंक – झौंक सब रचे – बसे रहते हैं । जब भी कहीं आंगन को मकान में शामिल कर लिया जाता है वहां से बनते सारे रिश्ते अपने आप बेदम हो जाते हैं ।एक जुमला यहां आत्मीयता के बेदम होने के प्रमाण रुप प्रस्तुत है —- ” क्यों चाची! तुम तो बहुत जाती थी उनके घर अब तो तुम दिखोई नहीं वहां ? हां! बेटी जब तलक उनको आंगन थो तब तलक थोड़ी बहुत देर – अंबेर चक्कर काट आते थे ! अब उनने मकान बना लयो आंगन – चौबारो नहीं रहयो ।तो अब कौन जाये ।घर के भीतर ? बस यूं ही बाहर से बात चीत कर लेवे और निकल जाओ अपने घर अब कहां बैठवे की फुर्सत धरी ।” ये हैं घर का फर्क और आंगन का अन्तर । आंगन बुलाता है हर सहजता को और घर के अन्दर का माहौल मनोवैज्ञानिक असर छोड़ता है ।हर रिश्ते को दबोचता है ।पकड़ कर रखना चाहता है । इसलिए जब भी आंगन का अस्तित्व समाप्त किया जायेगा वहां से आदमी का अकेलापन बढ़ता जायेगा ।आपसी बातचीत और संवाद खतम होते जायेंगे ।आदमी चारदीवारी में घिरा बिल्कुल अकेला हो जायेगा ।आंगन जरुरी है मानसिक स्वास्थ्य और दैहिक सेहत के लिए ।आंगन है तो आदमी का आदमी से ,खुद से खुद का रिश्ता बना रहता है ।शौक और रुचियां बनी रहती है आदमी का अखलाक जिन्दा रहता है ।आंगन होता है तो खुदगर्जी नहीं पनपती । आंगन जोड़ता है दुनिया जहान से ।घर का सूनापन और सन्नाटा दूर करता है ।अनुभव की परिपक्वता भी आती है आंगन के आर – पार । इसलिए जब भी आंगन के हिस्से मिटाये जायेंगे तब तब घर मकान बन जायेंगे ।आदमी कैद होगा घर – मकान की चौहद्दी में रिश्तों की मिठास फीकी हो जायेगी । आंगन लगाव का जरिया है । इसलिए हर हाल में आंगन को आबाद होते रहना चाहिए ।आंगन की महत्ता आदमी के लिए है मकान के या घर के लिए नहीं ।
🙏 विनीता रघुवंशी
आंगन-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता
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