5
विनीता रघुवंशी
रोशनी का अखण्ड सुहाग
*********************
( ३ )
कब तक —
काटता रहूं दिन ?
कब तक —
लिखता रहूं कविताएं ?
अब हम —-
मिले तो बिछुड़े नहीं !
लिखें तो —-
ऊबे थकें नहीं !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में नतीजा विहीन यात्रा ,सफर के साथ सवाल उठाया गया है ।धैर्य की नसीहत से मन ऊब चुका है ।आदर्श पर मन स्थिर नहीं है ।मन में अपने आप से ही बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं ।बेहतरी के सपने तो बहुत सारे मन में चित्त में इकट्ठे हैं लेकिन बेहतरी का माहौल जन समूह के जीवन में उतर नहीं पा रहा है । कब तक एक सवाल है ? बेहतर माहौल के आने की कोई तो अवधि या समय तय होगा ? कब जीवन में बदलाव आयेगा ? कब दिन फिरेंगे ? कब जन सामान्य के जीवन की सभी मुश्किलें दूर होंगी ? कब तक बेहतरी के ख्यालों में दिन काटूं , कविताएं लिखूं ? ये कितना कितना मुश्किल काम है ।एक आस में ,एक ख्याल में अपने आपको जिन्दा रखना ? धीरज बनाए रखना ।सबसे मुश्किल होता है ख्याल के भीतर एक उम्मीद जगाए रखना और हकीकत में बद से बदतर हालात में घिरे रहना ? यह सपनों के बीच यथार्थ की वह चुभन है जो मिटती नहीं ।एक अच्छे ख्याल ,विचार,और सपना संजोना आसान है लेकिन उसकी प्रतीक्षा बहुत पीड़ा दायक होती है । इसीलिए जब विचार की बेहतरी बनती है तो लगता है कि यह वैचारिक माहौल अब कभी भी नहीं बिछुड़े । वैचारिक सामंजस्य का माहौल ही वास्तव में बेहतर माहौल का जरिया है ।कविता का लिखा जाना एक बदलाव का रास्ता है ।याने समाज के संवेदनशील होने का रास्ता है ।यह जनसमूह का संवेदनशील होना एक सामाजिक बदलाव भी है और एक चेतना ,करुणा ,सत्य, दया,त्याग की अनुभूति भी है ।समाज का वैचारिक परिवर्तन ही वास्तव में बेहतर जीवन और समाज की नागरिक मौजूदगी है ।नफरत के चक्रव्यूह से बाहर आना और बेहतर सामाजिक मनुष्यता का सृजन ही सच्चा ज्ञान है ।यही रोशनी का अखण्ड सुहाग भी है ।जब साहित्य और समाज नजदीक आ जायें तब ही वे कभी बिछुड़े नहीं यह अभिलाषा कितनी कितनी निर्मल और पवित्र है ।यह समाज को समझना होगा । साहित्य ही समाज का सबसे बड़ा देवता है ।जब समाज के हर व्यक्ति में अध्ययन करने की आदत बन जायेगी तब समाज का स्वत: कल्याण हो जायेगा ।अध्यात्म और धर्म सदा ज्ञान के मार्ग से मोक्ष का संधान बताते हैं समाज की मुक्ति भी ज्ञान , स्वाध्याय ,उपदेश, कथाओं ,चिंतन – मनन में निहित मानी गई है ।चिंतन मनन और ज्ञान धाराओं का अनुसरण ही समाज की चेतना और विवेक को ऊबने और थकने से बचाता है ।समाज का उध्दारक तो साहित्य में ही समाहित है । साहित्य ही समाज की चेतना है ।यही जागृति है ।आज का समाज साहित्य से अपनी निकटता खत्म कर चुका है । इसीलिए दिशा हीन समाज दृष्टिहीन अवस्था में अज्ञान के अंधकार में यहां वहां भटक रहा है । वास्तविक रोशनी के लिए साहित्य की ओर ही समाज को लौटना होगा ।यह ज्ञान पुस्तकीय या प्रमाण – पत्रों की थप्पियों ( ढेर ) में नहीं वरन ज्ञान की जिज्ञासा और पिपासा में ही मिल पायेगा ।समाज की यात्रा अब इसी दिशा में होना चाहिए । साहित्य रोशनी का अखण्ड सौभाग्य है ।
