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रोशनी का अखण्ड सुहाग-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
रोशनी का अखण्ड सुहाग
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( २ )
एक आईना हूं
कि जिसमें
देखती हो खुद को
और सोचती हो
कि वह
सिर्फ तुम्हारा है !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज की कविता में आईना मन को दर्पण कहा जाता है ।यह मन रुपी दर्पण या आईना केवल मनुष्य के ही पास नहीं होता यह तो धरती के हर प्राणी के पास होता है जो स्पर्श से स्पन्दन तक महसूस होता है ।यही तो आईना आत्मा का प्रतिरुप है । जैसी मन ,बुध्दि,और चेतना का आत्म विरुपण होगा तब ही तो जगत के समस्त व्यवहार ,आचरण,धारणाएं सब प्रतिबिम्ब की भांति आत्म छवि बनकर प्रकट होंगे ।यह बिम्ब का प्रतिबिम्ब बन जाना ही तो आत्मा का चेतन रुप में प्रकट होना है ।यह अहसास ही आत्म – बिम्ब को भाव – बिम्ब, धारणा – बिम्ब, विचार – बिम्ब,कल्पना- बिम्ब , आकार – बिम्ब के रुप में मनोनुरुप उभारता है ।यही तो वह खुद है जो खुदी को अर्थात स्वयं को समग्र में प्रकट करता है ।यह स्वयं को पा जाने का जरिया है ।यह खुद को आईना में देखना बहुत गहरी आध्यात्मिक चेतना की प्रतीति है ।जिसे पाना मामूली अहसास नहीं ।यह गहरी से भी गहरी आत्मानुभूति है जो अन्तर – चेतना और विचार की संवेदना से उकेरी जाती है ।आईना देखना और उसमें मुख देखना दोनों सामान्य स्थिति है लेकिन जब मनुष्य अपनी चेतना का विस्तार करता है ।आत्म मुग्धता से मुक्त होता है तो यह दर्पण- दर्शन से जा जुड़ता है । यह दर्पण में छवि देखना साधारण या मामूली नहीं रहता । यह आत्म दर्शन हो जाता है । यहां आत्मा से ही विमर्श किया जा रहा है ।प्रिय की आत्मा में अपनी छवि निहारना और उसमें खो जाना या प्रिय का प्रिया में अपना छवि दर्शन दोनों एक ही अवस्था और भाव – दशा है ।यह परस्पर समा जाना है वैचारिक समागम है ।यह देहान्तरण नहीं आत्मान्तरण है । लेकिन इस आत्मा अन्तःकरण से निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता क्योंकि आत्मा एक दर्पण है और दर्पण में जो भी अपनी छवि को निहारेगा उसकी छवि का प्रतिरुप भी भिन्न होगा । इसलिए आईना उसी वक्त तक अपना है जब तक उसमें अपनी यानि खुद की प्रतिछवि दिखलाई दे रही है ।दर्पण या आईने का धर्म है छवि दर्शन कराने का जब तक मन में प्रेम की तरंग है या भाव – दशा है तब तक ही आईना अपना है अन्यथा वह दूसरे का प्रतिदर्शन उभारेगा ? दूसरे की प्रतिछवि का दर्शन करायेगा । आईना आत्मा का स्थापन तत्व है ।प्रेम का मूल भी निष्कपट साधारणीकरण के मध्य उजागर होता है । आईना तो आईना है उसमें छवियां बदलती रहती है ।वह कभी किसी का नहीं होता ।समाज को भी यदि हम एक दर्पण या आईना ही मान लें तो उसमें भी छवियां बदलती रहती है ।चमत्कार आईने में नहीं होता छवियों के रुपायन में होता है ।समाज एक बहुत बड़ा फलक है और उसमें बहुत सी छवियां अलग अलग क्षेत्रों में उभरती रहती है । साहित्य भी समाज का दर्पण है ।इस दर्पण में जैसा समाज का आचरण , विचार स्तर, मर्यादा का पालन ,शिक्षा – दीक्षा , स्वास्थ्य – तन का ,मन का, और बुध्दि बल का होगा वैसा ही साहित्य के फलक पर रचा हुआ दिखेगा । साहित्य और समाज दोनों जन – मन के संवाहक और चेतना के , संवेदना के और करुणा के सत्य का स्थापन करते हैं ।आज समाज अपने भटकाव में है तो साहित्य भी मूल्य चेतना और नैतिकता की तलाश कर रहा है । बुध्दि – बल अचेत अवस्था में है ।समाज को अचेत से सचेत करने का दायित्व निर्वाह साहित्य को ही निभाना है ।समाज को साहित्य के मार्गदर्शन में आकर अपनी छवि को महसूस करना होगा ।यह काम सहज नहीं है । साहित्य समाज का आईना है और उस पर किसी का एकाधिकार भाव नहीं रह सकता । 🙏विनीता रघुवंशी

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