Home आज की कविताभाषा ही होती हमारे बीच-नर्मदा की लहरों से

भाषा ही होती हमारे बीच-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
भाषा ही होती हमारे बीच
********************
( ७ )
शब्द जब
अर्थ यात्रा करते करते थक जाते
हो जाते निढाल
तो भाव-भंगिमाओं में प्रकट होते
हो जाते नाट्य प्रवीण
सूत्रधार की वार्ता
नायक खलनायक के संवाद
आकाश भाषित दृश्यन्तरण के
और अर्द्ध नारीश्वर कथ्य के
तब यवनिकाओ के साथ
अंगों के संचालन मात्र से
खुलते जाते अभिव्यक्ति के द्वार ।
संगीत के स्वर हो जाते शब्द
वाद्यों की तरंग भी
तब हद को पार कर
अनहद तक पहुंचकर खोलते
अनुभूति के लोक ।
रेखाओं से व्यक्त होते शब्द
जब तूलिका के हाथों
रंग – रंग के परिधान पहनते
तो कितने ही दृश्य
कितनी ही चित्र छवियां प्रकट होती
तब प्रेम का –पुरुषार्थ का
शौर्य – शान्ति का
समृध्दि – सर्वहारा का
मनुष्यता – दैन्य दारिद्रय का
अनुभव – संवेदना का
सपना – कल्पना – भावना का
इनका उनका सबका
अर्थ बताने लगते हैं ।
शब्द बच्चों के खेल में
टेसू बना मांगता दही – बड़ा
बोलता छल्ला बोली का छाला
और जब
नहीं देती डोकरी इस टेर पर
नया अनाज गमछे पर
तो समवेत स्वरों में गा उठते
गांव के खिलंदड़े
यह कि —
” अगवाड़े बोई तूमड़ी
पिछवाड़े गई बेल
तू क्या देगी मां
तेरा हंडिया – सा पेट ।”
ऐसा गाते -नाचते
बढ़ते जाते और
छेड़ते जाते गलियों में
गड्ब्या खेलती छोरियों को
और तनिक से व्यवधान में ही
सुनाने लगते होली के चुभते कबीर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता—” भाषा ही होती हमारे बीच ” के अंश में भाषा में अभिव्यक्ति का माध्यम बनते शब्द भी कभी – कभी समाज को वहीं अर्थ नहीं दे पाता जो वह पुरातन समय से देता आया है ।कभी कभी समाज की जरुरत , परिस्थितियां ,चेतना। और विचार में बदलाव हो जाता है और शब्द अपने अर्थ की बनी बनाई लीक को इतनी जल्दी नहीं बदल पाता तो भाषा का उपयोग करने वाला समाज उस थके हुए शब्द को छोड़कर अपनी जरुरत के मुताबिक कोई समानान्तर अर्थ देने वाला शब्द गढ़ लेता है ।सामाजिक बदलाव के साथ ही शब्द भी अपने अर्थ को विस्तार देता है या संकुचित कर लेता है ।यह सारी प्रक्रिया इतनी ज्यादा सहज होती है कि इस पर व्याकरण और भाषा – शास्त्र ,विज्ञान कोई प्रत्यक्ष नियम या पध्दति नहीं होती कि यह शब्द कहां से कैसे बना यह जाना जा सके लेकिन जब शब्द समाज की अभिव्यक्ति में शामिल हो जाता है तो वह प्रचलन में आ जाता है ।कभी शब्द का सृजन आक्रोश के लिए , कभी खीझ के लिए ,कभी आत्मीयता के प्रदर्शन के लिए ,कभी उपहास के लिए ,कभी असहमति के लिए या कभी समर्थन की अभिव्यक्ति के लिए भी होता है ।इस समय मीडिया में “गोदी मीडिया ” “लपड़ झण्डिस ” ऐसे ही शब्द सृजन का उदाहरण हैं ।यह समाज ने अपने आक्रोश और गुस्से को प्रकट करने के जरिये के लिए प्रयोग किया है । ऐसे बहुत से शब्द समाज की बुध्दि चातुर्य के प्रमाण – स्वरुप मिल जायेंगे ।शब्द जब अर्थ को व्यक्त करने में थक जाते हैं तो वे अभिनय के माध्यम से ,हाव – भाव से ,इशारों में नृत्य की भंगिमाओं से भी अधिक क्षमता के साथ समाज में अपने सामर्थ्य को प्रकट करते हैं । कभी कभी शब्द अपने साहित्यिक माध्यमों से अपने अर्थ नही बता पाता तब वह अभिनय ,आंगिक चेष्टाओं से भी अपने शब्द के अर्थ को ध्वनित करता है ।यह नाटक में सूत्रधार की वार्ता में हो सकता है ,नायक और खलनायक के संवाद में हो सकता है ।अभिनय भी एक भाषा प्रयोग ही होता है ।सामान्य जीवन में भी आंख मटकाना ,मुंह बनाना या नाक सिकोड़ना हाथ नचाना ,अंगुली उठाना ,आदि इसी अभिव्यक्ति और अभिनय के जरिए हैं । ये सब अभिनय के सशक्त हिस्से हैं इनमें शब्द ही छुपे होते हैं जो बोले नहीं जा रहे लेकिन बात , प्रतिक्रिया सब के बीच प्रकट हो रही है ।यह भाव भाव भी माकूल माध्यम हैं । अभिनय और हाव – भाव भी अप्रकट शब्द ही हैं ।संगीत की स्वर लहरी भी शब्द का प्रयोग ही है ।इस ध्वनि तरंग को यदि हम शब्द का तर्जुमा और अनुवाद ही कहें तो यह संगीत का वास्तविक अर्थ ही समझा जा सकता है ।स्वर लहरी जो शब्द को अपनी सीमा से बाहर आत्मा तक पहुंचा देती है वहीं तो संगीत का अनुभव और अनुश्रवण है ।यही तो नाद के पार जाना है । नाद की स्वर तंत्री जब हृदय और आत्मा की अनुभूति के द्वार खोलती है तब वह कोरा संगीत नहीं होता वह कोरी अनुभूति नहीं होती ।वह आत्मा से परमात्मा की हद तक पहुंच जाने का अनहद नाद है जो गहरे गहरे और और गंभीर होता जाता है ।उस विशेष अनहद को सुनने के लिए भी सूक्ष्म से सूक्ष्म आत्मा की अन्तर चेतना ,अन्तर संवेदना ,अन्तर बोध की जरुरत होती है ।यह अन्तर बोध ही वह अवस्था है जो तूलिका से बिखरता है तो एक सर्वोत्तम चित्र की सर्जना करता है ।क्या है में अन्तर बोध और अन्तर चेतना जो सभी कला जगत का सर्वोत्तम स्वरुप सृजित करी है ।इन सबके भीतर जो शब्द रचा – बसा है । वह अप्रकट है ।वह रहस्य है ।वहीं तो तलाश है ।वहीं नाद ब्रह्म की दशा है ,अवस्था है। कितनी ही चित्र छवियों में रेखा बनकर प्रकट होते हैं शब्द ।जो चित्र है वे प्रेम के हैं ,वे साहस और हौसलों के होते हैं ।वहीं तो वीरता भरे शब्द हैं ।वहीं सर्वहारा शब्द हैं ।वहीं शान्ति और अहिंसा से भरे करुणामय शब्द हैं ।वहीं दृश्य जो चित्रों में उकेरे गये हैं या सार्वभौम संसार के यथार्थ के दृश्यों में यहां – वहां दिखलाई पड़ते हैं वे दृश्य होकर भी शब्द ही हैं ।वे मनुष्यता के शब्द हों या मनुष्य की दरिद्रता के वे अभाव के शब्द हों या धनवान के शब्द हों ।ये समाज की हकीकत से जुड़े शब्द ही हैं ।शब्द बच्चो के खेल में भी रचे जाते हैं ।वह चाहे गड़ब्या हो या छल्ला बोली का गीत हो या संझा के खेल गीत हों या आरती और भजन हों या गालियां हो या होली के कबीर के रचे जाते भद्दे भौंडें अवसर गीत ।ये गीत भी अपने भद्दे पन में एक सामाजिक चेतना का बचाव करते हैं ।यह समाज की समूह चेतना का ही सृजन है जो यह जताती है कि समाज अपने शब्दों का समूह स्वरुप भी रच सकता है ।शब्द समाज की सामर्थ्य है । समाज की समग्र चेतना के बचाव से ही भाषा का सृजन होता है और भाषा शब्द का रुप धारण करके ही समग्र समाज में लोक व्यवहार का बचाव करती है ।भाषा अबूझ और अबोध के पास पहुंचकर शब्द सृजन के नये नये द्वार खोलती है । 🙏 विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More