4
विनीता रघुवंशी
भाषा ही होती हमारे बीच
********************
( ६ )
जब भरोसेमंद होता —
तब लिख दिया सो सही
वक्त पर काम आए की
पक्की इबारत होता शब्द
अविश्वास पाकर पहुंचता कचहरी
जहां शब्द ही करता
शब्द की पैरवी
दिलाता न्याय
मौत तक का फैसला देता – दिलाता
तोड़ता कलम की नोंक
और फांसी पर
झूलने के पहले की
अंतिम इच्छा की
पूर्ति भी होता वही ।
भाषा जो ख्यालीराम मास्साब ने
बारहखड़ी की
सीढ़ियां चढ़ाकर
ककहरा गाते हुए सिखाई थी
वह कंठ में —
कामधेनु -सी समाई है
तभी तो वर्णों के
धारोष्ण दूध की धार टूटती नहीं ।
शब्द सलकनपुर वाली
विंध्यवासिनी की
ऊंची पहाड़ी पर
चढ़ने की उमंग है
जहां पहुंच
ऐसा अनुभव होता कि
जो कुछ भी छोड़ आए हैं नीचे
वह कितना छोटा है
और दूर से नजर आती नर्मदा
अपनी धवल धारों के साथ
यूं लगती
मानों बहुत दूर छोड़ आए
शब्द के कछार को
समृध्दि के मायने देती
रजत खदानें उभर आई हैं ।
शब्द शब्द कंठ हार की तरह
गूंथा जाकर वाक्य बना —
जब विराम चिन्हों की छांव में
कभी अल्प -कभी अर्द्ध
कभी पूर्ण विश्राम कर
आगामी यात्रा पर निकलता तो
सुनने लायक होती पदचाप इसकी
जिसके अनुरणन से
कभी संबोधन – कभी उद्बोधन
कभी प्रश्नों की —
संकेत उर्मियों से स्पन्दित हो
सजा देता स्वरों के थाल में
भावों के ढेर सारे व्यंजन ।
शब्द कभी दिल से
कभी दिल दिमाग दोनों से
करता बात
और बरहमेश
घात संघात के विरुद्ध
मानवता की मुक्ति के
पक्ष में लड़ता है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता –“भाषा ही होती हमारे बीच ” के आज के अंश में शब्द के आदान – प्रदान के बीच एक अस्पष्ट सा भरोसा होता है जिस को आदमी मन ही मन महसूस करता है ।यह भरोसे का अहसास आत्मा के भीतर एक अजब – गजब दुनिया का रचाव भी करता है ।यह भरोसा भरा शब्द मामूली होते हुए भी खास हो जाता है ।यह मनुष्य के मन में बैठा प्रेम होता है ,करुणा होती है ,सेवा – टहल होती है ,प्यास की तृप्ति और क्षुधा का शमन होता है ।यह चिन्ता भी है और करार भी होता है ।यह साहित्य है ,यह वचन है ,यह हर शब्द इबारत है ,पूरा वाक्य है ।यही भरोसा भरा शब्द विरासत और साक्ष्य भी है ।जो सबूत है वक्त का । लेकिन जब भरोसा तोड़ा जाता है तो वह अदालत में खड़ा ईमान और बेईमान होने का ,धोखा और भरोसे के लिए तर्क – वितर्क भी शब्द में ही बयान करता है ।शब्द ही पैरवी है ,शब्द ही बहस है ,शब्द ही कानून की धारा और नियम है ।शब्द ही होते मौत के और फांसी के आदेश ।फांसी पर झूलने वाली की अंतिम इच्छा भी केवल शब्द ही होती है और पूर्ति के लिए दिए गये आदेश भी केवल शब्द ही होते हैं ।बचपन की प्रथम औपचारिक शिक्षा के दाखिले के साथ सीखें गये बारहखड़ी और ककहरा भी अभिच्छित शब्द ही हैं जो भाषा के रुप में आज भी हर समय कंठ में समाए हैं ।वर्णों की” धारोष्ण धार ” कितनी मोहक कल्पना ।लगता है वर्ण अपनी ऊर्जा और उस्मान को हर समय अमृतमय बनाए रखते हैं । इसीलिए तो वर्ण की धारा कभी विरल नहीं होती वह भाषा का रुप रख कर हरेक के कंठ में दूध की धार के रुप में समाई रहती है ।वर्ण भी तो शब्द की सबसे छोटी इकाई ही है ।बिना वर्ण के शब्द कहां ? शब्द सलकनपुर वाली विंध्य वाहिनी की ऊंचाई है जो समग्र संसार के भौतिक स्वरुप को लघुताई में महसूस कराती है ।समग्र संसार की भौतिक चेतना नगण्य हो जाती है । जो कुछ भी भौतिक ,सम्पदा ,वैभव सब बहुत बहुत छोटा है ।मामूली है ।विशेष है तो नर्मदा का वह मनोहारी रजत रुप जो विंध्यवासिनी की ऊंचाई से दृश्य- सदृश्य सम्मुख उपस्थित है । यह सात्विक मनोभाव की प्रतीति भी तो शब्द ही हैं ।शब्द ही शब्द का व्याकरण है ।शब्द ही अर्ध्द है और कभी पूर्ण है ।शब्द ही लोक यात्री है ।वह कभी भी कहीं भी किसी भी भाषा में अपने अर्थ और रुप के साथ शामिल हो सकता है ।शब्द ही यात्री है ।शब्द ही संबोधन है ।शब्द ही उपदेश और भाषण हैं ,शब्द ही वक्तव्य हैं । शब्द ही भावों का स्पन्दन है। जो सहृदय से लेकर हर हृदय वान के बीच विचरण करता है । शब्द ही दिल है ।शब्द ही दिल और दिमाग दोनों है ।सहृदय की बुध्दि की तीव्रता और हृदय में स्थित भावनाओं के बिम्ब , प्रतीक,उपमा,उत्प्रेक्षा, कल्पना के हर स्पन्दन में शब्द ही विराजमान हैं ।यह शब्द की ही सत्ता है जो मानवता की मुक्ति के पक्ष में हर समय लड़ता है ।यह शब्द का संघर्ष है जो हर काल हर समय हर अवधि में केवल और केवल मनुष्यता के हित में संघर्ष करता है ।जो प्रेम की गंभीरता और करुणा की द्रवणशीलता के मायने समझाता है ।शब्द की सत्ता और सामर्थ्य ही है जो मनुष्य के हित साहित्य में समाज बनकर अभिव्यक्त होते हैं ।शब्द समाज के हर व्यक्त और अव्यक्त अवस्थाओं का दिग्दर्शन कराया है ।जो भाषा में निबद्ध शब्द है वह भी शब्द ही हैं ।
