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विनीता रघुवंशी
भरी पूरी सृष्टि
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मुझसेे अकेले मिलतेे वक्त भी
अकेले नहीं होते
एक पूरे परिवेश के साथ मिलते हो तुम
बातें करते तो लगता —
कि झर रहें हों पुष्प आश्वस्ति के
शब्द शब्द
अनुराग की अर्थालय में डूबै होते हैं तुम्हारे
और भाव ऐसे
मानों फलों में पकते बीज हों
तुम इस तरह मिलते हो
जैसे कि लिहाफ फेंककर
दिन को प्रभात मिलता है
जैसे कि फसलों को
किरनों का गुनगुना स्पर्श मिलता है
तुम कुछ इसी तरह मिलते हो दोस्त
और जब भी मिलते हो
आंख भर देखते हो
कान भर सुनते हो
मन भर गुनते हो एक एक बात
सौगात यह कविता ने दी है हमें
कि हम अकेले मिलते वक्त भी
अकेले नहीं होते
एक भरा पूरा पर्यावरण होता है हमारे साथ
जैसे कि जमीन आकाश अकेले होकर भी
अकेले नहीं होते
एक भरी पूरी सृष्टि होती है उनके साथ ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में मिलन और मिलन भी मित्र से । सम्पूर्ण संसार मित्र भाव की ही परिणीति है । सृष्टिक्रम का समग्र संचालन मैत्री भाव से ही होता है ।जब भी कोई दो मित्र मिलते हैं तो उनके बीच के वार्तालाप में घर -परिवार ,सगे संबंधी ,माता का सम्मान और पिता का प्यार ,अपत्य स्नेह समाया रहता है । वहीं बहन के ब्याह की चिन्ता और भाई के रोजगार की फिक्र होती है ।और तो और खेती किसानी फसल के हालचाल नदियों के सूखने यां ठण्ड गर्मी बरसात से जुड़ी बातें होती हैं या बरस भर आने वाले तीज -त्यौहार का जिक्र होता है ।जो घनिष्ठ मित्र हैं उसके साथ बातें करते ये सब जिक्र शामिल होते हैं ।दोस्त का मिलना याने चिन्ताओं का साझा हो जाना ।आपसी बातचीत में उसके परिजन अपने परिजन बन जाना ।यहीं तो है मित्र मिलन । मित्र की परेशानी सुख दुख का साझा हो जाना ही तो है असल दोस्ती की बुनियाद ।या गोस्वामी तुलसीदास जी की पंक्तियों में कहें तो दारुण दुख का हरण करने वाला होता है मित्र ।दोस्त का मिलना और मन हर्षित हो जाना ।दोस्त कभी कभी भी अकेला नहीं मिलता वह जब भी हमारे आस-पास होगा तब उसके परिजन ,उसका पास पड़ोस ,उसके परिजन संस्कार आचरण पारिवारिक परिवेश ,लालन- पालन,धारणाएं, आस्थाएं, रीति – रिवाज , परम्परा ,नैतिक अवधारणा और मानवीय मूल्य सब का मिलन होता है ।आदमी का। कोई भी रिश्ता और संबंध कभी भी समाज और संस्कृति से अलग थलग नहीं होता ।मित्र का मिलना ही एक भरोसा आश्वस्ति का मिलना होता है ।दोस्त के मिलन की अनुभूति उसके शब्द शब्द में होती है ।शब्द शब्द के अर्थ का अहसास फलों में पकते बीज की तरह मालूम होते हैं । कितनी मनोरम कल्पना है ।क्या कोई आज तक फलों के भीतर पकते बीजों का अनुमान अपने अनुभवों में उतार पाया है ? यह मित्र मिलन भी साधारण होते हुए भी असाधारण हो गया है मित्र के मिलने का अहसास इतना ताजगी और स्फूर्ति से भरा है कि जैसे सुबह सुबह का आराम के बाद का जागना या जैसे प्रातः काल में सूर्योदय की गुनगुनी किरनों का फसलो को छूना कितना मन मोहक भाव और दृश्य की कल्पना है यह है मित्र के मिलन का असर जिसमें ताजगी है ।जिसमें स्फूर्ति है ।जिसमें गुनगुनी उष्मा का समागम है ।जब भी मिलते हो तब वह मिलनानुभव कितना कितना मर्मस्पर्शी होता है आंख भर देखना याने सेहत को परखना । स्वास्थ्य की चिन्ता फिक्र से जुड़ी बातों से दिल को तसल्ली देना ।कान भर सुनना भी कितनी भावाकुल अनुभूति है ।कान भर सुनना याने ध्यान से बात सुनना जिससे यह जान सके कि मित्र कहीं संकट या पीड़ा को छुपा तो नहीं रहा ।बातों में कहीं कृत्रिम कष्ट को ढक लेने की चेष्टा तो नहीं ।याने मित्र की अन्तरलय ,अन्तरधारा, अन्तर विचार की असल पहचान के स्पन्दन को महसूस कर लेने का प्रयास ही तो है । यह मित्रता का आधार है संवेदना की वह बुनियाद जो साहित्य और कविता देती है ।जो आदमी और आदमी के बीच एक सच्ची भावाकुलता का सृजन करती है ।दोस्त तो वही है जो बिना कहे सब अनुभूत करे । मनुष्य का सृजन साहित्य ही करता है ।जब भी आदमी की बात होती है तब तब पूरी सृष्टि उसके साथ अपने भरे पूरे परिवेश के साथ शामिल होती है ।अकेला तो कोई भी कहीं भी नही होता ।उसके आसपास हर वक्त चींटी से लेकर हाथी तक या पौधों से लेकर महा वृक्ष तक उसके बाहर -भीतर को उत्प्रेरित करता रहता है ।हर समय हर काल में हर जगह मौजूद हैं एक भरी पूरी सृष्टि ।
