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विनीता रघुवंशी
ताकि बनी रहे
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मैं हमेशा हमेशा
छोटा कवि
बना रहना चाहता
ताकि बनी रहे
बड़ी कविता
रचने की लालसा सदैव
और छोटी कविता
रचते हुए बड़ा कवि होने के
भ्रम को नहीं पालूं अंत तक ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– “ मंजती धुलती पतीली ” से उद्धृत )
आज की कविता वैचारिक कविता है और समीक्षा शास्त्र की दृष्टि से कवि -कर्म पर विचार किया गया है । विरह के मर्मज्ञ महाकवि घनानंद कहते हैं —” लोग हैं लागी कवित्त बनावत ,मोहे तो मोरे कवित्त बनावत ” कविता करुणा की भाव भूमि की अनुभूति और संवेदना का संश्लेषण मिलकर रचना बनाती है । साहित्य एवं ना तो कोई छोटा कवि होता है ना बड़ा कवि ।ये मान दण्ड ही भ्रम की स्थिति बनाते हैं । घनानंद का यह कहना कि लोग बड़ी मेहनत से , शब्दों को चुन चुनकर ,करीने से सजाकर भावभूमि की रचना करते हैं । लेकिन कविता केवल तुकबंदी नहीं है वरन् यह तो सहज आत्मानुभूति से निसृत कर्म है ।यह कवि की विनम्रता ही है कि वह छोटा कवि बना रहना चाहता है ताकि महाकवि कालिदास,विद्यापति ,तुलसी दास,सूरदास आदि कवि बनने की चाह मन में हमेशा बनी रहे । हमेशा उस करुणा के मर्म को स्पर्श किया जा सके जिसमें मानवीय चेतना ,मानव धर्म ,न्याय -अन्याय का बोध, समाया हुआ हो ।ऐसी रचना किस तरह बेहतर कही जा सकती है जो किसी व्यक्ति की ,सत्ता की ,समाज की मर्यादा तोड़ती , या चापलूसी और चाटुकारी , स्वार्थ सिध्द करने के लिए लिखी गई हो ।ऐसी कविता हर हमेशा छोटी रचना ही रहेगी । कवि भले महाकवि ही क्यों ना हो लेकिन उसका लेखन कर्म मूल्य चेतना से विलग जाता हो तो वह केवल शब्दों की कारीगरी ही है ।शब्द विन्यास की कलाबाजी दिखाकर कोई भी कवि या रचनाकार अपनी हैसियत को दोगुना -चौगुना जतला सकता है ।सत्ता को प्रभावित करके बहुत से पुरस्कार भी पा सकता है लेकिन बड़ा कवि तो वही है जो जन वेदना के मर्म को स्वछंद भाव से निर्भय होकर रचता है । गोस्वामी तुलसीदास जी तब ही तो लिख पाये — “संतन को कहा सीकरी सो काम ” ऐसी वैचारिक दृढ़ता है तो कवि भले छोटा हो लेकिन उसका आत्मबोध बहुत बहुत बड़ा होता है ।कवि कर्म की महत्ता तो इसी में है कि वह मानव चेतना के पक्ष ,दशा ,अवस्था का दिग्दर्शन अपनी रचना में उद्घाटित करे ।चाहे वह रचना महाकाव्य ना हो लेकिन मनुष्य के हित में रची गई हो ।कवि -कर्म वही सार्थक है जो भ्रम से मुक्त करे । यदि कोई कवि महानगर में निवास कर रहा है और बहुत सारे पुरस्कारों की जोड़ -जुगाड़ में माहिर है तो फिर चाहे कविता में मानव चेतना को धक्का भी पहुंच रहा है तो भी वह बड़ा रचनाकार हैं क्योंकि पुरस्कार उसका मापदण्ड है ।मूल्य चेतना से विरत रचना करके भी यदि कोई बड़ा कवि हैं तो यह भ्रम ही है ।यथा चेतना जीवन और यथा चेतना लेखन ।समाज में चेतना युक्त लेखन को समादृत किया जाना चाहिए ।जो कविता मनुष्य के हित चिन्तन से दूर है वह कविता कविता नहीं होती ।उसमें कविता का धर्म ,न्याय , संवेदना ,करुणा का पक्ष पोषण नही होता है ।कविता का धर्म है लोक कल्याण और लोक मंगल ।संसार में भ्रम बहुत तरह के होते हैं और कवि – कर्म की चेतना भी एक गहरे अहम् को जन्म देती है ।जो सच्चे कवि कर्म को निबाहते हैं उनमें अहंकार नहीं वरन वैचारिक रुप से समाज के प्रति स्वीकृत भाव रहता है ।जन ही तो वह सामाजिक बोध का स्रोत है जहां से मानवीय करुणा और संवेदना का ग्रहण किया जाता है । इसीलिए जन बोध से जुड़ा कवि चाहे छोटी रचना रचे लेकिन उसकी संवेदना और करुणा की अनुभूति की जमीन ठोस , यथार्थ , और दृढ़ होती है ।उसका मानवीय पक्ष में किया गया लेखन उसे बड़ा कवि बना देता है ।जिसे घनानंद ने स्वीकार किया है कि –मोहे तो मेरे कवित्त बनावत ” कवि की चेतना बड़ी होनी चाहिए भले कविता का आकार लघु हो ,लम्बा हो या खण्ड काव्य हो या महाकाव्य । समाज चेतना ,मानव चेतना और लोक चिन्तन ही महत्वपूर्ण है ।
