Home आज की कविताआठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस
************************
( २ )
लेकिन इससे क्या होता है
तू तो पैदा भर हुआ था
उस दिन
ठीक उसी तरह
जिस तरह हुए थे
तेरे पहले के भाई बहन
यह कहते
गला भर आया मां का
और वह
अकाल मौत मरे
उन भाई बहनों को याद करती
आठ जनवरी
छत्तीस के करीब लौटी
कि तभी —
बढ़नें लगी धड़कनें उसकी
उखड़ने लगी सांस
और हांफने लगी
इसलिए कि —
उलटी गिनती के सहारे
बीते दिनों की तरफ
लौट रही थी
जहां रोक रही थीं
स्मृतियां उसे
ठीक उसी तरह
जिस तरह कि —
थक्कों से जमी शिराएं
रोक लेतीं रक्त संचरण
स्मृति के आघात में
अब भी
यादों के कई रंग
कई ढंग
कई किस्से
कई जायके
मौजूद हैं
उसकी जुबान पर
ठीक उसी तरह
जिस तरह कि
ऊपरी मंजिलों के
ध्वस्त होने के
बाद भी
शेष मंजिलों की
दुखती आंखों में
चश्मदीद वाकये समाए रहते
जिनको —-
करुणा और कराह के साथ
की भावों के बीच
बार – बार
याद करती
मेरे सिर पर हाथ फेरती हुई मां
बारंबार मुस्कुराती है
और हर बार
उसकी मुस्कुराहट का चेहरा
अलग – अलग होता ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता —-“आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस ” के आज के अंश में मां के पास स्मृतियों की पोटली है और वह धीरे धीरे अपने समय में यादों के साथ लौट रही है । मां की उम्र है और उम्र के पास अब लौटना नहीं वरन आगे गंतव्य पर बढ़ जाना है । यह एक गंतव्य है मौत की तरफ बढ़ना ।उलटी गिनती का शुरु हो जाना ।यह कितना कारुणिक है उम्र का धीरे धीरे गुजरना ।इस गुजरने के दरम्यान ही गुजरे वक्त में फिर फिर लौटना ।उस प्रसव वेदना और शिशु आगमन के सुखद क्षण जो सहेजे हैं मन में स्मृतियों में आत्मा में उनमें से फिर से गुजरना कितना कितना मुश्किल है ।पर मां है तो व्यक्ति कितना ही बड़ा हो जाये मां की नजरों में वह हर पल नन्हा ही रहता है ।ममत्व सदाबहार बना रहता है ।शिशु के जन्म लेने से कुछ नहीं होता जैसे सब पैदा होते हैं वैसे ही कोई एक जन्म लेता है ।जन्म लेना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना उसकी चेतना का बोध होना ।मेरा जन्म क्यों हुआ ? मैं क्यों पैदा हुआ ? मेरे जन्म से धरती पर क्या फर्क पड़ेगा ? ये सब सवाल जब मन में कौंध पैदा नहीं करेंगे तब तक मनुष्य धरती पर कोई हैसियत नहीं रच सकेगा ।मां की स्मृति में उमड़ते घुमड़ते रहते हैं अकाल काल कवलित शिशु ,गर्भपात से अजन्मे शिशु मां अब भी स्मृतियों से भरी गले में रुदन समेटे रहती है ।मां का गला रुंध गया है ।आंखें नम हैं ।आज की स्त्री अपनी इसी मातृत्व की शक्ति से मुक्त होना चाहती है । वह आधुनिकता के बहाव में मां नहीं बनना चाहती ? क्या यह उसकी अस्मिता , अस्तित्व और शक्ति का विसर्जन नहीं ? महाभारत की उत्तरा का आत्म रोदन क्या इसी तरह के अजन्मे शिशुओं पर ब्रह्मास्त्र का प्रहार की व्यथा वेदना की याद नहीं दिलाता । मां के मन में हमेशा जीवित होते अजन्मे और अकाल मृत्यु के गर्त में समाए बच्चे ।मां की आंखें नम ही होती है अपने अकाल मौत में समाए बच्चों के लिए । वृद्धावस्था में स्मृतियों के सहारे युवा गृहिणी के उस अहसास को पुनर्जीवित करना कितना कितना हृदय स्पर्शी और संवेदना भरा होता है यह समझा जा सकता है मौत की तरफ बढ़ती मां की आत्मानुभूति के सहारे । मां को स्मृतियों में लौटने की क्रिया भी किस तरह कठिनाई से भरी है रक्त शिराओं में रक्त के थक्कों से अवरुद्ध रक्त संचरण कितनी मार्मिक कल्पना ।कितनी हृदय स्पर्शी भी ।यों हृदय रोगी की बात छेड़ने से भी मन विचलित हो जाता है लेकिन मां की मनोस्थिति का चित्रण और अहसास कितनी सहृदयता से ।मां की जुबान पर अब भी बीता हुआ समय जायके की तरह मौजूद हैं ।इन किस्सों में आदमी के व्यवहार के बहुत सारे जायके या कहें स्वाद हैं कब किन स्थितियों में किससे मदद मिली और किसने मदद के बजाए टका सा जवाब दे दिया ,किसी ने ताना मारा और किसी ने बखत पर हाथ खींच लिया ।यह जीवन के उतार चढ़ाव हैं ।जीवन की कठिनाई और बेसहारा हो जाने के ढंग हैं ।शायद यही तो जीवन की लाचारी और उसके बीच अपने आपको जमाये रहने के हालात हैं । संभवतः यही आदमी के बचपन से बुढ़ापे तक के सफर की दास्तान है ।जो अनुभव की जमा पूंजी होती है ।यही तो आदमी की दुखती आंखों के मंजर हैं जो जब तब आंसू बनकर गालों पर ढुलक आते हैं ।यही तो बेबसी होती है जो आंखों देखे बने हालात को अपनी याद की गठरी – पोटली में समेटते रहते हैं और धीरे धीरे पार करते हैं यादों भरे सफर को मौत तक संभाले संभाले ।बस बची रहती है तो चेहरे पर अपनी संतान की सफलताओं को मुस्कुराते हुए सिर सहलाना , सिर पर हाथ फेरना ।उसकी मुस्कुराहट बार बार संतान के चेहरे और मनोभाव पढ़ते हुए बदलती है ।वह संतति के कर्मशील जीवन में खोजती है अपने वैचारिक अस्तित्व को वह इसलिए भी मुस्कुराती है ।उसका मुस्कुराना आशीर्वाद भी है ।उसका मुस्कुराना प्रशंसा भी है ।उसका मुस्कुराना अपने गौरव का अभिवादन भी है । मुस्कुराते हुए मां का चेहरा संतान का हौंसला भी है । मां है तो दुनिया जहान है ।
🙏विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More