Home आज की कविताआठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही
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( ३ )
तब लगता कि मां के पास
जाने कितने —
उजड़े बसे चेहरे हैं यादों के
और जाने कितनी मुद्रा में
मुस्कुराते हैं वे
फिर खिल -खिलाकर बोली —
तेरे पैदा होने पर ही
मेरे जीवन का
अकेलापन
इतना दूर हो गया था
जितना कि उत्सव के आते ही
सन्नाटा
या कि पहाड़ी गांव से समुद्र
उसी दिन
सुक्को बलान को भी
हुई थी बेटी
दिनों बाद पनघट पर
बताया था उसने
कि उसे भी
कुछ इसी तरह का
हुआ था महसूस
काम से निपट
जब भी
चुमती मुझे
मेरे आस-पास बिखरने लगती
सभी लोकों की चांदनी
झूले में झुलाती
तो लगता
भविष्य का कोई समर्थ स्वप्न
पालने में खेल रहा हो
किलकारियां भरता
तो लगता
मानों उन स्वरों में
शुरु हो रहा हो
भाषा का रचाव
और जब भी सुनाती
लोरिया तुझे
तो खुद भी
मीठी झपकियों के साथ क्षणभर
उस लोक में पहुंच जाती
जहां पृथ्वी की
सबसे ठोस और
सबसे सुंदर क्रीड़ास्थली
के भाल पर
मानों कोई महोत्सव
सज-धज कर उतर आया हो ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता —” आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही ” के आज के अंश में मां की अन्तर आत्म अनुभूति का चित्रण है । दुनिया की हर मां के लिए संतान का जन्म इसी तरह की आत्मिक अनुभूति का जीवन्त अनुभव है ।मां बनना सृष्टि का अनमोल उपहार है ।यह मातृत्व का अहसास प्राणी मात्र के आत्मिक अनुभव संसार की सबसे बड़ी सम्पदा है । मां की स्मृतियों में मुख – मुद्रा के विविध रूप दृष्टि में समाए हैं और दृष्टि से ओझल भी है ।वे स्मृतियों में जब तब मुस्कुराते हैं ।जब तब मां भी उन्हें याद कर मुस्कुराती है ।ये वे अहसास है जिनमें दुख संताप और वेदना तो है ही वे पल भी अनुभव बनकर मौजूद हैं जिनमें मन थोड़ा कमजोर हुआ और जोखिमों का सामना करने का हौंसला टूटने लगा लेकिन फिर अगले ही पल में सामना कर लेने की हिम्मत भी जुटाई ।आज जब स्थितियां अनुकूल हैं तब मन उस अवस्था के प्रति सचेत हो कर मुस्कुरा रहा है कि वे भी पल कितने विचलित कर देने वाले थे ।भरोसा बिलकुल टूटने की कगार पर था और हार जाने की दशा सामने खड़ी थी ।वह कितना विस्मय कारी समय था ? निसंतानता समाज में कितना बड़ा अभिशाप माना जाता है और उससे भी बड़ी विषम स्थिति होती है बार बार गोद के फूल झरे जाने की ? यह झर जाना या शिशुओं की अकाल मृत्यु के अनुभव भी बेबसी के कारण बन जाते हैं समाज में ।उन सब अहसासों से पार जाना भी मुस्कुराने की वजह बन जाती है ।मुस्कुराहट तंज भी है और चतुराई का तीखा तेवर भी है ।मुस्कुराहट के कई अभिप्राय निकाले जा सकते हैं ।मां का मुस्कुराना तो संतान के हौंसले के लिए ही होता है ।संतान का जन्म मां की खिलखिलाहट को भी जन्म देता है ।कहां जाता है कि यदि मनुष्य के मन का विरेचन यदि कहीं होता है तो उसे बच्चे को खिलाते वक्त देखना चाहिए क्योंकि जब कोई भी व्यक्ति बच्चे को दुलराता है तो अपनी अवस्था व्यस्कता या प्रौढ़ता को विस्मृत कर देता है । यही तो है बच्चे के साथ बच्चा बन जाने की अनुभूति । सब कुछ भूल जाना । यह है बच्चे की उपस्थिति का असर ,प्रभाव ।मातृत्व के बगैर मां के मन में जो अकेलापन पसरा है उसकी आत्मानुभूति के लिए प्रयुक्त शब्द कितने कितने मर्म से भरे हैं — संतान का आगमन याने भीतर की चुप्पी को तोड़ने का जरिया या पहाड़ से समुद्र के दूर हो जाने का अहसास ।यह समुद्र का दूर जाना याने निराशा के भंवर में डूब जाने का अनुभव भी तो है । या जीवन में उत्सव की उमंग और उत्साह का लौट आने का अनुभव और अनुभूति ही तो है । माता कौशल्या भी श्री राम को सजा संवार कर पालने में पौढ़ाती है और ब्रह्माण्ड के दर्शन करती है ।यहां भी मां अपने शिशु को पालने में झुलाती है तो भविष्य के समर्थ स्वप्न के खेलने विचार मन में उभरता है ।यह विचार मामूली नहीं है ।आज की कितनी ही माताएं इस तरह के वैचारिक भविष्य को निर्मित करने के प्रयास करती हैं ।यह चिन्तन का विषय है ।आज यह भी माता को ही तय करना है कि संतान का जीवन दिशा क्या होगी ?वह भविष्य में समाज की चेतना को किस रुप में ,किस दिशा में ,और किस दशा ,अवस्था में लेकर जायेगा ।केवल जन्म ले लेना ही पर्याप्त नहीं है ? जन्म तो कीड़े – मकौड़े और जीव – जन्तु भी लेते हैं विचार हीन मनुष्य भी समाज में एक पशु से ज्यादा कोई अहमियत नहीं रखता । लेकिन यदि मनुष्य जन्म लेकर सामाजिक चेतना , संवेदना और करुणा के विचार के साथ अपने को प्रामाणिक बनाता है जिस तरह महावीर स्वामी ,गौतम बुध्द ,श्रीराम ,श्री कृष्ण और अर्जुन और महात्मा गांधी के नाम साक्ष्य के रुप में प्रयुक्त होते हैं ।तब यह विचार और विवेक जन्म महोत्सव के रुप में मान्यता पा सकता है ।अन्यथा मोमबत्ती और केक के साथ हम खूब जन्म दिन मनाते रहें कोई फर्क नहीं पड़ता समाज वहीं का वहीं होगा स्थिर और जड़, नफरत फैलाता और हिंसक होता ।समाज चेतना खोता हुआ ।मां को ही समर्थ भविष्य को पालने में झुलाना है ।मां संसार सृजन की चेतना है ।
🙏विनीता रघुवंशी

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