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रहने लायक है दुनिया
अभी इतनी खराब
नहीं हुई दुनिया
कि रहा ही नहीं जाए इस पर
ऐसा कभी होगा भी नहीं
अभी तो —
झाडुएँ बनाने और
बुहारने वालों को
हर मोर्चे पर
तैनात करने की घडी़ है
धूल धक्कड़ उछालने वाले
हाथों में वह दम नहीं
कि इसी में लगे रहें हरदम
इतनी खराब नहीं हुई दुनिया
कि झाड़-पोंछकर —
न रहा जाए इस पर
कटीली झाडि़यों में
अब भी —
पाए जाते नरम -नरम पत्ते
अब भी ढेर -ढेर फूलती हैं वे
गाली कुट्टों की
जुबान के एक कोने में
अब भी घुलती है प्यार की मिश्री
घायलों को गोद में उठाए
अब भी जब तब
तत्पर रहतीं रेडक्रास की गाडी़
और नफरत इतनी संहारक नहीं हुई
कि सृजन की पूरी धार ही सोख ले
चाहे जितने हथियार जमा कर ले कोई
लेकिन भाईचारे की
धूप -दीप -अगरु भावना से
अब भी —
बडी़ नहीं हो सकती
बारुदी गंध
बमों का धुआँ
निस्तेज है
शांति की लोभान के मुकाबले
और कबिरा की धूनी से
अब भी —
प्रतिवाद नहीं कर सकती बदबू
यह दुनिया —
अब भी
रहने लायक है हर कहीं ।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ” नर्मदा की लहरों से ” उद्धृत )
