नाला —- ६ ************ सप्तपदी की श्वेत जटाओं से रेशा रेशा धागा लिए चल रहा चट्टानों का हथकरघा और धार – धार तानों बानों- से बुनी जा रही पानी की …
नाला —-५ ********** सुबह – सुबह भाप छोड़ता दोपहर तक माथे पर तटछैंया का फटा गमछा लपेटे किरनों की वंशी में प्रेम चारा लगाये मछलियां पकड़ने का खेल खेलता नाला …
नाला —४ ********* पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता उज्जवल कोमल नवजात की तरह किलकारियां भरता लहरों की डोर से — भर भर पैंगे झूल रहा है नाला अकेला मत …
नाला —३ ********* ताजी ताजी कुनकुनी बूंदी- सा चासनी सहित जहां तहां छितर जाता नाला और रिसक कर गोल गोल लड्डू – सा कुण्ड में समा जाता चाहे चूरा हो …
नाला — २ ********* बांस वन के घोंसलों से मानों किसी गोरैया के पके अण्डे से निकलकर चेनुए – सा फुदक रहा नाला जिसे चुगाने दूर तक छिटक रही बाड़े …
सतपुड़ा की पसलियो से रिसता : धनपाड़ा का नाला ( नाला — १ ) पहाड़ों पठारों से होकर सिर पर समा– धान की पुटरिया लादे हाट को निकले आदिवासियों –सा …
इतना ही नहीं सोचा **************** जब देने ही निकले तो गालियां ही दी तुमने ! दुआएं भी तो दे सकते थे जबकि दोनों ही आवाज की बेटियां हैं !! इतना …
कविता होते हैं बच्चे ****************** फूल पत्ती पर लिखना है लिखना है तितली पे कविता नदी झरनों पर लिखना है लिखना है चिड़ियों पे कविता सूरज चांद तारों पर लिखना …
