Home आज की कवितानाले का जनेऊ पहने पहाड़-पकी फसल के बीच

नाले का जनेऊ पहने पहाड़-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
नाला —- ११
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नाले का जनेऊ पहने पहाड़
अंधेरे में नहाने की
अनुभूति का स्फुरण लिए
जब माथे पर पगडण्डी की चुटइयां बांधें
सुनसान रात में फेंफर तले
तांत्रिक चबूतरे पर जा बैठता
तो रम्हाने लगती आंधियां
हिन हिना उठते पेड़
और अपनी जिजीविषा के साथ
फड़फडा़ उठते मुर्ग -तीतर- बटेर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” की पांडुलिपि से उद्धृत )
नाला प्रवाह के साथ किनारों पर बसी बस्तियों की आस्था का यथार्थ भी उजागर करती है ।किस तरह जंगल में देव – धामी ,पूजा – पाठ ,चढ़ावा और बलि को सहज विश्वास के साथ निभाया जाता है ।नाले को पहाड़ जनेऊ की तरह पहने नाला एक कर्मकाण्डी पंडित का रुप धारण कर लेता है ।अलसुबह वह नाले में नहा धोकर अपनी आसंदी पर वनवासियों के सहज भरोसे को अलख का नाम देकर बलि ,पूजा ,भेंट आदि का अंधेरा फैलाता है ।यहां अंधेरे में नहाना भी एक प्रतीक है । वैचारिक अन्धकार में नहाना ? आस्था के अंधेरे में नहाना ? यहां पहाड़ रुप वान हो रहा है पंडित की तरह जिसने पगडण्डी की चुट इयां बांध रखी है । यह पण्डित जन समूह की समस्याओं का समाधान खोजता है ।उनके समाधान में पूजा की हिदायतें देता है ।निर्धन आदिवासी पूजा सामग्री के नाम पर पशु और पक्षियों की बलि व्यवस्था देना । “तांत्रिक चबूतरा “यह भी प्रतीक है उस पाखंड भरी धार्मिकता का जहां अपढ़ आदिवासी अपनी हर कठिनाई का निदान इस तरह के तांत्रिक चबूतरों में खोजते हैं । यहां वैज्ञानिक विचारो और ज्ञान का अभाव है लेकिन भरोसे के सौ प्रतिशत निदान संभव है ।बाबा यहां का हर मर्ज की दवा है ।जब जब यह देशज बाबा अपनी आसंदी पर बैठता है तब तब हजारों आंधियां रम्हाने लगती ।यह भी एक प्रतीक है “रम्हाना ” याने भैंसें की मां , बकरे की मां , बछड़े की मां ,भेड़ की मां , और भी न जाने कितने ही पशुओं के बीच घबराहट फैल जाती है और वे अपनी जान की दुहाई देते हैं ।इस पण्डिताई में जंगल के हर कर्ज,मर्ज, रोग और समस्या का समाधान छुपा हुआ है । पेड़ भी इस तरह की धाम स्थल को देखकर कंपित हैं । जहां जीवन रक्षा के नाम पर जीवन को अंधकार का स्नान कराया जा रहा है ।यह है अंधेरे में नहाने की अनुभूति ।पण्डित भी अंध विश्वासी और जन समुदाय भी अंधविश्वासों ।दोनों ही अंधेरे में नहा रहे हैं ।यह अंधेरा वैचारिक अंधेरा है । वैज्ञानिक विचारों का अंधेरा है । यह अनुभूति का स्फुरण किसी किसी को भी होता है ।सब इस अनुभूति को महसूस नहीं कर पाते हैं ।यह नहाना केवल पण्डित बनने के लिए नहीं है यह अंधेरे का नहाना जजमान बनने के लिए भी है। धार्मिक दिखने के लिए भी है ।यह नहाना पण्डिताई की रैयत बनने के लिए भी है ।जब समुदाय वैचारिक अंधेरे में है तब ही तो उसका गुरु ,उसका मार्गदर्शन करने वाला पण्डित भी तो अज्ञानी है केवल भेष और बाना पहने हुएं हैं ।पण्डित अपने स्वार्थ साधन में माहिर हैं और उसी तरह जन समूह भी अंधविश्वासों के बीच फंसा अपने जीवन यथार्थ से दूर थोथे निदान खोजने में उलझा है । इसीलिए जब पण्डित अंधेरे में नहा रहा है तो उसके नहाने में तीतर ,बटेर ,और मुर्ग अपनी जीजिविषा के साथ फड़फड़ा उठते हैं कि अब उनकी जान पर खतरा आ गया है ।अब भेंट में मुर्ग,तीतर,या बटेर की मांग होगी ? यही तो है जंगल की “बाबा धाम “का चढ़ावा । सतपुड़ा के अंचल में और जंगल के बीच ऐसे बहुत से देव – स्थल नाम की तरह मौजूद मिल जायेंगे जहां आदिवासी समाज अपने रक्षण के तौर – तरीके तलाशता है और सहज अंध विश्वास के फेर में उलझता जाता है ।यह भी नाले का जीवन विन्यास है ।जो सतपुड़ा के अंचल में समाया हुआ है । पहाड़ों की अपनी सादगी और सरलता भरी जीवन शैली है । उसके पास अपनी समस्याएं हैं और उनके समाधान के तरीके हैं । यह भी एक तरीका है मनुष्य के अपनी चिन्ताओं से मुक्त होने का ,निदान तलाशने का ,आस्था का गहरा स्वरुप भी है , यह प्रमाण है मनुष्य की जिजीविषा का जो उसके अन्तरमन को सहज करता है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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