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विनीता रघुवंशी
नाला —- १०
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वो देखो !
दबे पांव आखेट को
निकला है नाला
अब किसी न किसी
उत्सव की
तैयारी करने ही वाला है पगला – – – !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच “” की पांडुलिपि से उद्धृत )
सतपुड़ा अंचल की प्राणधारा बना नाला अब एक दृश्य में तब्दील हो चुका है ।एक राजसी भाव का ,एक सत्ता का रुप धारण कर चुका है नाला ।अपने राजसी भाव में मगन नाला आखेट जीवी हो गया ।आखेट याने शिकार करने वाला नाला ।यह आखेट ,यह शिकार किसी मनुष्य का भी हो सकता है ,किसी पशु का भी हो सकता है ,किसी पंछी का भी हो सकता है ,किसी मुर्गे का या वनवासी जीवन जन्तु किसी का भी हो सकता है ।यह वनवासी की सादगी भरी जीवन शैली ही है कि वह मेहमान नवाजी के लिए ,उत्सव या जश्न मनाने के लिए , त्यौहार में उल्लास और उमंग भरने के लिए किसी न किसी का शिकार करते हैं और इस तरह उनके उत्सव की शुरुआत होती है ।जंगल आधारित पशुओं की प्राण रक्षा भी यही वनवासी ,आदिवासी करते हैं और अपने जश्न की उमंगों की हर जरुरत को भी जंगल से ही पूरी करते हैं ।इनका जीवन जितना सादगी भरा है उतनी ही सादगी भरी है जीवन शैली । इनके जीवन में धनार्जन की होड़ नहीं न दिखावा ही इनकी मूल चेतना में शामिल हैं ।जो कुछ है वह जीवन का हिस्सा है । यहां आधुनिकता का मर्यादा हीन दिखावा नहीं है बल्कि जो कुछ है वह आदिवासी जीवन की बुनियादी डोर में बंधी रीति – रिवाज ,परम्पराएं , नीतियां, परस्पर जीवन – बोध , मानवीय चेतना से भरी सामाजिक चेतना का अकृत्रिम भाव उपस्थित होता है ।जंगल में प्रेम है ,क्रोध है, ईर्ष्या है ,द्वेष है , आक्रोश है , दण्ड है ,न्याय है , सेवा है ,सत्य है ,निष्ठा है , आस्था का भोलापन है , और है भरोसे की नैसर्गिक वृत्ति । इन सब में जीता ,इन सब से अपनी प्राणधारा सृजित करता नाला बड़ा ही आत्मीय है । इसीलिए तो यह ” पगला ” है अपने उत्साह में , अपने लगाव और सेवा – सम्मान को व्यक्त करने के लिए । किसी भी शहरी की आव – भगत ,आतिथ्य के आयोजन को उत्सव की तरह मनाने में “पगला” है । यह आत्मीय संबोधन भी कितना अकृत्रिम है । निश्च्छल – सा ,निर्मल – सा , आत्मा तक को तर कर देने वाला ।यही तो आत्मिक आंनद का अहसास है । यही तो आत्मा को स्पर्श करने वाली अनुभूति है ।यही तो वह चेतना है जो अन्तर लय -सी महसूस होती है ।यही है जीवन – राग का सर्वव्याप्त हो जाना । यह भाव से उल्लास में बदलता –” पगला ” हो जाना है । यही तो भाव -चेतना का विस्तार है ।
