Home आज की कविताअभी अभी नाले में हिरनियां-पकी फसल के बीच

अभी अभी नाले में हिरनियां-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
नाला — ९
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अभी अभी नाले में हिरनियां
खुरों से आंखें खुजलाती
रोयां रोयां चाटती रही देह
और भेड़ियों की आहट पाते ही
छलांगती हुई समा गई पहाड़ में
प्रवाहित है धनपाड़े में
जीवन राग की तरह
सतपुड़ा के तप का मोतिया रंग
जो रेत कंकर तक को तृप्त करता
जड़ों से होकर छुग्गन तक
पेड़ पेड़ हरियाता
फूल फल पत्तियों की नसों में
लहरा रहा है
चिलकती धूप में
सूरज की किरनों पर सवार
आकाश मार्ग से दिनभर
वन संपदा की चौकसी करता नाला
और शाम होते ही
चांद – तारों की रश्मि डोर से उतर
टिमकियों की लोक थापों पर आलापें भर
नाचता रहता भोर तक ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” की पांडुलिपि से उद्धृत )
हिरनियो का गुरों से अपनी आंखों की कोर को खुजलाना बहुत ही नाजुक ,कोमल , नरम, मुलायम और महीन अहसास भरा दृश्य है ।यह दृश्य इसलिए भी आकर्षक और सुंदर है क्योंकि हिरनी के गुर सख्त होते हैं और आंखों की कोर देह की बहुत ही नाजुक स्थान है फिर भी पशु अपनी आंखों की कोर को जब खुजलाते हैं तब किसी प्रकार की चोट न लगे ,जख्म न हो इसका ध्यान रखते हैं ।जिस तरह मनुष्य स्नान द्वारा अपनी देह की साफ – सफाई करता है उसी तरह पशु – पक्षी भी समय समय पर अपने तन की साफ – सफाई और सुथरा करते रहते हैं ।उनके पास भी देह का बोध होता है । गंदगी उन्हें भी महसूस होती है और सफाई की यह चेतना भी उनमें नैसर्गिक ही होती है । अपनी आत्मरक्षा में भी वे सजग हैं । भेड़ियों की आहट पाते ही वे जंगलों में छुपती हैं ।धनपाड़े का नाला एक रुपक है जो जीवन राग की तरह अंचल में समाया हुआ है ।यह नाला लोक संस्कृति का रचाव करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । सतपुड़ा का पूरा अंचल हरा-भरा है नाले के निरंतर प्रवाहित रहने की वजह से । वन संपदा की चौकसी भी नाला ही करता है क्योंकि हर किसी के बस में नहीं होता नाले के प्रवाह को काट कर तैरना ,पार कर पाना , मुश्किल होता है । इसलिए नाला है तो वन की सीमा की तरह है । जिसमें चोरी करने के मकसद से कोई घुस नहीं सकता । ये वनवासी ,आदिवासी दिन रात अपनी वन सामग्री की चौकसी करते हैं और रातभर टिकी के चिटकोरे पर अपना श्रम परिहार करते हैं । यह है वनवासियों का सादगी भरा जीवन जिसमें नाला बहुत महत्व रखता है ।वैसे भी जहां जहां जल स्रोत होते हैं वहां वहां जन समुदाय का जीवन विकास संभव हो ही जाता है ।सतपुड़ा में जल है ,जंगल है और जन समूह है तो जीवन का प्रवाह और जीवन रस भी है ।नाला कवि मन में रचा बसा है इसलिए नवीन रुप छवियों के साथ कविता बनकर यह प्रकट होता रहता है ।यही “नाला ” की चेतना का वजूद है ।हर बार नाला के साथ जंगल के मनोरम दृश्यों में झांक आने का अवसर मिलता है ।यह एक सिलसिला है रचना का जो ” नाला ” की तरह ही प्रवाहित है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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