Home आज की कवितानाले में जो बह रहा-पकी फसल के बीच

नाले में जो बह रहा-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
नाला — ७
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नाले में जो बह रहा
वह पहाड़ ही तो है
करुणा से पिघलता
कभी का सूख गया होता
जीवन का नीर
अंगारों की बांहें यदि
कदम कदम नहीं थामतीं उसे
या कि फूलों तितलियों वनस्पतियों ने
नहीं झुलाते होते बीजने
या कि नहीं दी होती
पेड़ों – झाड़ियों ने छांह भर सहानुभूति
या कि नहीं पोंछा होता
हवाओं ने बदन का पसीना
अपनी हाड़ हाड़ देही के रहते
नाले संग जिन्दा है
इसीलिए पहाड़ ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” पकी फसल के बीच ” की पांडुलिपि से उद्धृत )
नाला अंचल के अस्तित्व का प्रतिरुप ही है । नाले के जीवन को बचाये रखने के लिए पहाड़ के अस्तित्व का महत्व है ।नाला यदि जीवित है तो वह पहाड़ के इर्द – गिर्द होने के कारण है ।नाले में जो बहकर आ रही है वह मिट्टी, वे कंकड़ – पत्थर सब पहाड़ के अंश का रिसाव है जो पानी के साथ बह रहा है ।यदि नाले के पानी के साथ पहाड़ मिलकर नहीं बहता तो नाला सूख जाता ।नाले के कगारों को यदि पहाड़ सहारा नहीं देता तो नाला कहीं भी लुप्त हो जाता । इसलिए नाले के जीवन संरक्षण के लिए पहाड़ बहुत जरुरी है ।या नाले के किनारों पर उगी वनस्पतियां ,पेड़ – पौधे पंछी ,तितलियां भी बहुत जीवन लायक है ।ये नाले के आसपास शीतल बयार बहा रही है जैसे नाला राजसी व्यक्ति हो और उसके आसपास वनस्पतियां बीजने से हवा कर रही है । पेड़ों – झाड़ियों की। जो छांह नाले को ढक रही है उन्होंने भी नाले को बचा रखा है ।ठण्डी हवाओं ने भी नाले को जीवन दिया । इसीलिए पहाड़ अपनी कठोरता ,अपनी सख्त पत्थरों , चट्टानों के साथ नाले के संग – साथ जिन्दा है ।पहाड़ों है तो नाला भी है ।यही नाले की वास्तविकता है ।बिना दृढ़ता के करुणा का विस्तार नहीं हो सकता ।नाला और पहाड़ दोनों का परस्पर अस्तित्व एक – दूसरे पर निर्भर है ।
यही प्रकृति का सानिध्य है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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