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विनीता रघुवंशी
नाला —- ६
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सप्तपदी की श्वेत जटाओं से
रेशा रेशा धागा लिए
चल रहा चट्टानों का हथकरघा
और धार – धार तानों बानों- से
बुनी जा रही पानी की चादर
जिसे कन्धों पर डाले
बिना किसी विश्राम की चाहत लिए
अलमस्त कबीर – सा अलग जगाता
बहे जा रहा धनपाड़े का नाला ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” पकी फसल के बीच ” की पांडुलिपि से उद्धृत)
धनपाडें के नाले में कबीर जैसे विचारक की छवि की कल्पना और धीरे – गंभीर चेतना का अनुमान एक सृजन कर्ता की जागृति पैदा करने वाली रचना ।
कबीर आत्मा को चादर का प्रतिरुप बनाते हैं –“झीनी झीनी बीनी चदरिया ” कहकर वे आत्मा के बेदाग होने की साक्षी देते हैं ।झीनी झीनी याने बहुत ही महीन धागों से बुनी चादर ,कोमल नरम ,मुलायम चादर ।आत्मा भी इतनी ही कोमल है ,मुलायम है ,धर्म है , दयार्द्र है ।यही तो मन की संवेदनशीलता है जो जरा जरा सी बात में उदास हो जाती है ,मायूस हो जाती है ,कुम्हला जाती है ,और करुणा से विगलित होकर दया का भाव अजस्र स्रोत बनकर बहने लगता है ।यह ही तो है आत्मा की झीनी झीनी चादर जिस पर हर सूक्ष्म भाव चेतना का असर पड़ता है ।कविता में भी सप्तपदी अर्थात धागों की लहरिया ,गुच्छे ,तार अलगनी पर लटके हैं । यह अलगनी है सतपुड़ा का पहाड़ जिस पर नाले की धार लपटी हुई है और चट्टानों का हथकरघा चल रहा है । चादर बुनी जा रही है बिल्कुल महीन ।जलधारा वाली चादर ।पानी की चादर । यह चादर बहुत ही अनूठी है ।यह कबीर जैसे चिन्तक ने अपने कंधों पर डाल रखी है जो समाज को जागृत करने के लिए निरंतर बह रहा है ।धनपाड़े का नाला भी कबीर – सा धीर – गंभीर विचारक ,चिन्तक जैसा अलमस्त , बेफिक्र सतपुड़ा अंचल में बह रहा है ।आदिवासी वनवासियों की चेतना को जगाने के लिए बह रहा है ।हर समय यात्रित बना हुआ है । यह अलख जगाने का दायित्व वह बिना विश्राम किये कर रहा है ।महात्मा गांधी ने भी हथकरघा ,चरखा को ही को ही अपनी अहिंसा का जरिया बनाया था और इससे मेनचेस्टर की कपड़ा मिलें ठप्प पड़ गयी थी । ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने का यह जरिया भारतीय समाज की बदहाली रोकने वाला जरिया बना ।यही तो है सच्ची अलख। जागृति की आवाज । धनपाड़ा का नाला भी अंचल के किसानों को , वनवासियों को और आदिवासियों को निरंतर चेतना करने की प्रेरणा दे रहा है ।
