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विनीता रघुवंशी
नाला —-५
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सुबह – सुबह भाप छोड़ता
दोपहर तक माथे पर
तटछैंया का फटा गमछा लपेटे
किरनों की वंशी में प्रेम चारा लगाये
मछलियां पकड़ने का खेल खेलता नाला
और शाम होते होते
भस्कारों में डूबकर
जंगल की शिराओं में प्रवाहित
कच्ची का सुरुर हो जाता
फिर चट्टानों के तकिए पर सिर रखे
खर्राटों की अन्तर्लय पर
फेसकुर की चादर ताने हो जाता
जिसकी रखवाली करता सन्नाटा
रात भर बोलता रहता हुर्र हुर्र हु–र्र – – – ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
नाला -पांच में आदिवासी की जीवन चर्या और उसमें अभावों का ,निर्धनता का जो स्वरुप है वह झलकता है ।नाला सुबह सुबह भाप छोड़ रहा है याने रात भर के विराम से उठती हुई उबासी का निस्तारा करता नाला । वनवासी की दैनिक गतिविधियों में समाई हलचल है । किरनों की वंशी का मतलब है वह डण्डी जिससे नाले की मछलियों को पकड़ा जाता है ।किरनों की वंशी में एक कोमल कल्पना का समावेश किया गया है ऐसी डण्डी जो बहुत ही लचीली है उसमें प्रेम रुपी चारा लगाया गया है याने प्रेम की मनुहार में मछलियां फंसाई जा रही। हैं ।ये वनवासी कन्याओं ,बालाओं के लिए भी उपयुक्त है और मछलियों को तो फांसा ही जा रहा है ।शाम होते होते कच्ची शराब जो महुआ लाहन से अमूमन आदिवासियों के हर घर में पकाई ही जाती है ।हर वनवासी के जीवन में उसका नशा समाया हुआ है ।आदिवासी इस नशे में मदद मस्त होकर अपनी आर्थिक दशा पर कोई गहरा विचार नहीं कर पाते ।यह उनके लिए इसलिए भी सुविधा जनक है क्योंकि महुआ के पेड़ जंगल में खुद ब खुद उग आते हैं । और वनवासियों को बस उन्हें बीनना पड़ता है वे इसे बाजार में बेच भी देते हैं और खुद भी उपयोग कर लेते हैं इसलिए यह तरल पदार्थ उनके पास उनकी प्राण पदार्थ होता है । बहुत से शहरी भी इसी आकर्षण में जंगलों की सैर करते हैं और आदिवासियों की आजीविका के इस साधन को बढ़ावा देते हैं ।एक वनवासी के जीवन की यह हलचल सन्नाटों के सहारे ही व्यतीत होती है ।जंगलों में भटकना और सुरुर में डूब जाना कितनी निराशा जनक स्थिति है वनवासी जीवन ।निरंतर मेहनत ,निरंतर संघर्ष ,निरंतर कठिनाई निरंतर आपदा ,निरंतर उदासी ,निरंतर मायूसी , निरंतर सन्नाटा ,निरंतर सूनापन , निरंतर तंगी , इन सबके बीच अपनी विपदाओं को नींद में भगाता हुर्र हुर्र का स्वर ।यह वह किस को भगा रहा है अपने दुर्भाग्य को ,अपनी कमजोरियों को ,अपने जीवन में व्याप्त मायूसी को ,अपने जीवन की आर्थिक विपन्नता को ।क्या है वहां जो भगाने लायक है ? वह आर्थिक विपन्नता है । सादगी भरा जीवन और व्यर्थ की आपाधापी से निरालस जीवन ही तो जंगल के समान ऊंचा – नीचा ,रपटीला , नाले- सा बहता । नाला जीवन की सादगी का प्रतीक है ।जंगल में नाला भी प्रकृति का सबसे बड़ा उपहार है और उसी के आसरे टिका जीवन ,जीवन की हलचल । जंगल के अपने स्वर ,अपनी आवाजें ,अपना बुना सन्नाटा और अपनी मुखरता अपना मौन और अपनी चहचहाट ।सब कुछ भरपूर है ।फसलें हैं और उनकी रक्षा की चेतना नींद में भी समाई है । इसलिए तो हुर्र – हुर्र की रट लगाये रात भर बोलता है जंगल ।
