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नाला —३
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ताजी ताजी
कुनकुनी बूंदी- सा
चासनी सहित जहां तहां
छितर जाता नाला
और रिसक कर
गोल गोल लड्डू – सा
कुण्ड में समा जाता
चाहे चूरा हो या लड्डू
हर हाल में मीठा ही लगता नाला ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “पकी फसल के बीच ” की पांडुलिपि से उद्धृत )
—” कोस- कोस पर बानी बदले ,पांच कोस पर पानी ” यह जन कहावत या लोकोक्ति ‘ नाला ‘ पर खरी उतरती है । कोष – कोस पर बानी अर्थात लोक बोली का स्वरुप बदल जाता है ।उसकी देशज ध्वनियों में बदलाव आ जाता है ।या कहें कि ट़ोन या लहजा बदल जाता है । इस तरह लोक बोली के कई रुप समाज में प्रचलित होते हैं और लोक अपनी अभिव्यक्ति के लिए इन बोली रुपों का भाषा रुपो का बेझिझक प्रयोग करता है ।इसी तरह हर पांच कोस पर पानी अर्थात हूं जल या कुओं का जल या आज कल हेण्डपम्प, बोरिंग के पानी का स्वाद हर जगह बदल जाता है ।नाला जो सतपुड़ा के जंगल की धरोहर है या उसके बीच से अपनी राह बनाये हुए हैं उसका स्वाद हर हमेशा मीठा ही रहता है ।वह भले ही कुण्ड में समा जाये या यों ही बहता रहे वह गोल – गोल लड्डू सा अपनी
आकृति बदलता रहे या छितर कर बहे याने बिखर कर बहे ।उसका पानी हर हाल में मीठा ही है ।नाला हर आकृति में स्वाद युक्त ही है । नाला तो प्रकृति की देन है ।जंगल के पेड़ों की जड़ों ने रचा है । इसलिए जहां भी जड़ें होगी वहां लगाव का रस तो मीठा ही होगा ।नाला भी अपनी जड़ों के बीच से उत्पन्न हुआ इसीलिए उसकी आत्मा में मिठास है ।प्रवाह में धीर – गंभीर बहाव है । व्यंजन की आकृतियों की उत्प्रेक्षा और मनोहारी कल्पना ने – ‘नाला ‘ को एक मोहक स्वरुप दे दिया है । यह थाल का मीठा मोहन भोग सा प्रतीत हो रहा है। हम भ्रमण करते हुए बहुत से मनमोहक प्राकृतिक दृश्य और नदी ,झरने ,प्रपात आदि देखते हैं । लेकिन हमें वे आन्तरिक आनंद की कल्पनाओं में नहीं ढाल पाते ।धनपाड़ा का नाला इस तरह की कल्पनाओं को साकार करने में प्रेरक बना यही उसकी आकर्षण क्षमता है । प्रकृति का उपादान –‘ नाला ‘ संवेदना और चेतना का हिस्सा बना यही उसकी सामाजिक उपस्थिति है । इस तरह धनपाड़ा गांव भी आकर्षण में जग जाहिर हो गया । अंचल से वाकिफ रचनाकार की यही सबसे बड़ी उपलब्धि है कि वह अपने अंचल को ठीक से जानता – पहचानता है ।
विनीता रघुवंशी
