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विनीता रघुवंशी
नाला — २
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बांस वन के घोंसलों से
मानों किसी गोरैया के
पके अण्डे से निकलकर
चेनुए – सा फुदक रहा नाला
जिसे चुगाने दूर तक
छिटक रही बाड़े – बाड़े
कोदों –कुटकी — बाजरे की
छरहरी बालियां ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–* पकी फसल के बीच ” की पांडुलिपि से उद्धृत )
नाला सतपुड़ा अंचल के बीच प्रवाहित है ।धनपाड़ा एक गांव है । जहां से होकर नाला बह रहा है ।यह रहटगांव और राजा बरारी स्टेट के मध्य स्थित है ।राजा बरारी स्टेट भी भारत की एकमात्र स्टेट आजादी के बाद भी अस्तित्व में हैं । उसके स्टेट बने रहने के पीछे भी एक किस्सा वर्तमान में मौजूद हैं ।यह किस्सा भी राधा स्वामी इन्टर नेशनल ट्रस्ट से जुड़ा है ।किस्सा यूं है कि राजा बरारी गवासेन की भूमि एक अंग्रेज वार विडो को बतौर मुआवजा के अंग्रेज सरकार द्वारा प्रदान की गई थी । अंग्रेज महिला भारत छोड़ कर ब्रिटेन वापस जा रही थी संयोग से वह रेल के जिस कूपे में यात्रा कर रही थी उसी कूपे में आगरा के राधा स्वामी के– “गुरु हुजूर ” भी यात्रा कर रहे थे ।बस यहीं दोनों की जान – पहचान हुई और बातचीत संवाद में खुलासा हुआ कि उनके पास अंग्रेज सरकार द्वारा बहुत बड़ा इलाका गुजर – बसर के लिए उन्हें बतौर मुआवजा दिया गया है लेकिन अब वे भारत छोड़कर जा रहीं हैं तो उस भूमि का उनके लिए कोई उपयोग नहीं है ।उनकी विनम्र प्रार्थना है कि उस भूमि को कभी बेचा नहीं जाये और वहां जो आदिवासी हैं उनको कभी उस इलाके से बेदखल न किया जाये ।इस तरह वह भूमि लीज पर गुरु – हुजूर ” को मिल गई ।इस तरह राजा बरारी स्टेट का विलय भारतीय संघ में होते हुए भी अस्तित्व स्टेट के रुप में बना रहा ।आज भी वहां की रौनक और प्रबंधन बहुत ही व्यवस्थित है हायर सेकेण्डरी स्कूल हैं ,प्राथमिक स्कूल हैं जिनमें परिवार के साथ रहते हुए वे उच्च शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं । यहीं बहता है नाला जो पहाड़ रुपी घोंसले में से चेनुए की तरह निकलता है ।आदिवासी वनवासी पहाड़ में जो फसल उगाते हैं वह मानो इस छोटे से गोरैया के चेनुए के चुगने के लिए ही बोई जाती है ।कोदों एक प्रकार का घास का बीज ही है जिसे वनवासी अपने भोजन में शामिल करते हैं ,कुटकी चावल का एक प्रकार है यह भी वनवासियों के भोज्य सामग्री में शामिल हैं ।बाजरा तो सभी सामान्य जन समुदाय के भोजन का हिस्सा ) है ही । बांसवन के घोंसले याने सघन बांसो के भिंड़ो से निकलता नाला ।कितनी अनूठी कल्पना और कितनी मनोरम उत्प्रेक्षा । यह अनूठा पन प्रकृति ने अपनी पहाड़ी संरचना से दी है । जहां जहां प्रकृति अपने घुमाव ,मोड़, और चक्करों को बनाती है तब तब धरती अपने प्राकृतिक सौन्दर्य को अनोखा पन देती जाती है । धनपाड़ा का नाला भी सतपुड़ा की पसलियों से रिस कर एक नया सौन्दर्य प्रकृति को दे रहा है ।नाला जगह जगह बलखाता बह रहा है इसलिए ही वह सुन्दर बन पड़ा है ।सतपुड़ा अपने प्रकृति के अकूत भंडार पर इठला सकता है ।अपने सेहतमंद होने पर इतरा सकता है ।टनटनाट है सतपुड़ा अर्थात यहां के वनवासियों का स्वास्थ्य बेहतर है ।जंगल के कंद – मूल -फल और उपज खाकर ।
शहरी समाज को भी अपनी सेहत का ध्यान रखने के लिए प्रकृति के निदान को अपनाना चाहिए ।प्रकृति ही समाधान है मनुष्य की सेहत और स्वाद, चेतना का , संवेदना का ।
