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हमारा चाहने वाला
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हमारा चाहने वाला
जरुरत से ज्यादा
अपेक्षाएं करने लगता है हमसे
तो वह हमारे लिए
स्वादिष्ट भोजन की तरह होकर भी
उदरशूल उठाता वायुविकारी हो जाता ।
पूरी की पूरी दिनचर्या ही
बदल जाती उसकी
और वह
हिंसक पशु में तब्दील होता
जाने कब —
अपनी ही अकर्मण्य इच्छाओं की
अंधेरी गुफाओं में बैठा
नाखून पजाने लगता ।
हमारा चाहने वाला
जब अनर्गल अपेक्षाएं करने लगता हमसे
तो वह, भाषा के संस्कारों से भटककर
दांत किटकिटाता
हिंसक ध्वनियों का रचाव करने लगता
और ध्वस्त करने लगता है
हमारा ही रचा संसार हमारे सामने ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —— “ देखा , बिना नाम के तुम्हें ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी की शख्सियत से जुड़ी अपेक्षाओं की वह बंदिश है जिसमें आदमी खुद -ब-खुद बंदी बन जाता है ।यह लोकप्रियता चाहे सामाजिक जीवन में हो ,अभिनय में हो , राजनीति में हो , अध्यात्म में हो , आर्थिक क्षेत्र में हो या परिवार में हो , मोहल्ले और काॅलोनी में हो , साहित्य में हो ,बुध्दि, संवेदना ,करुणा ,दया ,सेवा के क्षेत्र में हो ।ख्याति कहीं भी हो उपलब्धि कहीं भी हो ,किसी भी जगह हो । व्यक्ति की पसंद उसकी कर्मठता , कर्मशील जीवन एक चाहने वालों का समूह बना ही देती है ।यह चाहने वालों का समूह ही वह मनोविज्ञान गढ़ देता है जिसमें शख्सियत एक उम्मीदों के बीच घिर जाती है ।पसंद करने वालों का एक मजबूत घेरा चारों ओर से ढक लेता है ।एक कद खुद ब खुद आदमी की सामान्यता और साधारण हैसियत को विशिष्टता के कवच में बांध देता है ।आदमी को मजबूरन पसंद करने वालों की रुचि -अभिरुचि अनुसार आचरण और व्यवहार करना पड़ता है । यह लोकप्रियता की कैद होती है जो आदमी को सरल सादगी और सामान्य लोक व्यवहार से दूर एक ऐसे मनोविज्ञान और मनःस्थिति में तब्दील कर देता है कि ना चाहकर भी सबकी अपेक्षाओं को पूरा करने उन्हें संतुष्ट करने के लिए व्यवहार का अतिक्राम आचरण का दिखावा करना पड़ता है । यह हैसियत ।यह कद की ऊंचाई सब वास्तव में ढोंग होता है ।जो लोकप्रियता की उस सतह को बनाए रखने का कुल कौशल और हुनर होता है ।आदमी का विशिष्ट हो जाना और उस विशिष्टता को अपने चारों ओर लपेट लेना एक घातक स्थिति है ।इस स्थिति से बाहर हो पाना सरल नहीं होता ।अपनी सामान्य दिनचर्या को यथावत और यथाविधि वह जारी नहीं रख पाता इस लोकप्रियता के घेरे में बंधें व्यक्ति का न तो खुद का जीवन सहज होता है न घर -परिवार के साथ सुखद और शान्ति मय पल – क्षण ही बीत पाते हैं ।आदमी की लोकप्रियता का बढ़ना याने उसकी स्वाभाविक धारणाओं का ,मानवीय आचरण का बदल जाना है ।वह खुद को भूल कर केवल चाहने वालों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की जद्दोजहद में अपना समय ,अपना व्यक्तिगत जीवन के प्यार ,लगाव , अपनी प्रकृति प्रदत्त भूख- नींद -आराम -विश्राम , यात्रा ,आस्था- विश्वास ,विचार -विवेक , संवेदना -करुणा, अपनी रुचि -अरुचि ,धर्म -कर्म सबके प्रति असतर्क और असचेत हो जाता है ।उसके चिन्तन और ध्यान में हर हमेशा चाहने वाले ,अपेक्षा करने वाले , पसंद करने वालों की इच्छाएं रहेंगी ।जब भी कोई मनुष्य लोकप्रियता की इस अबूझ पहेली के फेर में उलझ जाता है तो जो उसका निजी स्वभाव है जो उसकी मानवीय इच्छाएं हैं जो उसकी अपनी प्रकृति और धारणाएं हैं जो उसका मूल भाव है उस सब से अलग -विलग वह मूल रुप को छोड़कर केवल चाहने वालों के इच्छा रुप को धारण कर लेता है ।यह रुपान्तरण सामान्य नहीं होता यह बदलाव ऊपर से ओढ़ा गया है जो प्रकृति के विपरीत है इसलिए हिंसक है ।अपने आप को मार कर चोला पहना गया है जिसमें खुद की मर्जी नहीं इसलिए यह चोला पहनावा , परिधान ,परिवार ,परिवेश ,रहन -सहन ,खान-पान, सब अस्वाभाविक ही है।सबमें दिखावे और प्रदर्शन की अस्वाभाविकता भरी है ।यह तन -मन की जरुरत के अनुकूल नहीं है तब भी इसे मन माफिक माना जाता है ।क्योंकि सब चाहने वालों की इच्छाओं का ध्यान रखना है ।यह चाहत मनोनुकूल होते हुए भी हिंसक होती है एक शख्सियत बनने के लिए विशिष्ट दिखने के लिए और उस लोकप्रियता के पैमाने को बनाए रखने के लिए मन के विपरीत मरजी के खिलाफ अपने आपको खरा उतारना पड़ता है ।यह पसंद का व्यवहार है ।यह पसंद का व्यापार है ।यह व्यवसाय और व्यवस्था है । अपेक्षा करने वालों की उम्मीद पर खरा उतरना उतना आसान काम नहीं है ।हर बार उम्मीद जताने वाले शख्सियत और व्यक्तित्वों को एक हिंसक पशु में बदल देते हैं ।ये हिंसक बनी शख्सियतें और नेतृत्व कारी व्यक्तित्व लोक इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने आदिम और खूंख्वार औजार नाखूनों में धार करने लगते हैं ।यह बिम्ब सचमुच विचारणीय है । लोकप्रियता एक ऐसी अंधेरी गुफा है जिसमें यदि एक बार आदमी प्रविष्ट हो जाता है तो उसमें दिशा का ज्ञान समाप्त हो जाता है ।आदमी अपने मानवीय रुप को भूल जाता है और पशुत्व के आचरण को स्वीकार कर लेता है ।वह आत्म रुप विस्मृत कर देता है ।यह बहुत ही विचारणीय है कि पसंद करने वालों ,चाहने वालों की भावनाओं का सम्मान अवश्य करना चाहिए लेकिन जब वे किसी भी शख्सियत के वजूद को निगलने लगे तो अपने संसार को नष्ट होने से बचाना भी जरुरी होता है ।हर मनुष्य अपने पसंद करने वालों से कहीं न कहीं घिरा ही होता है और कहीं न कहीं किसी न किसी को पसंद भी करता ही है ।पर हर बार यह समझ तो रखना ही चाहिए कि किसी भी मनुष्य की लोकप्रियता उसके निजत्व और निजी जीवन को आहत न करे । अपेक्षाएं इतनी विराट और विशाल न हो जाए कि आदमी का वजूद ही बौना कर दे ।उस पर क्रोध और श्राप की बरसात होने लगे ।हर व्यक्ति हर कामना इच्छा को पूरी करने की क्षमता नहीं रखता है ।जो उसका अपना रचा संसार है उसमें उसे निर्द्वन्द्व भाव से रमण करने देना चाहिए ।यही लोकप्रियता की सच्ची मिसाल होती है ।वास्तव में लोकप्रिय होने का मायना है बंदी जीवन व्यतीत करना ।
विनीता रघुवंशी
