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विनीता रघुवंशी
आकार लेती यात्राएं
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( २ )
खटिया पर लेटी दादी मां
शाम होते ही आंगन में
अपने नाती पोतों से
हाथ – पांव दबवाती
सुना रही कहानी – – –
पांवों की सफाई पसंद राजकुमार
धूल से परेशान हो — पिटवाता है डोंडी
बा हुकुम बा मुलाहिजा होशियार !
फरमान है ये सरकार का –कि
दस दिनों के भीतर
धूल को देश निकाला दिया जाना है
चूंकि धूल बार – बार समझाने के
बावजूद बाज नहीं आती है — और
राजकुमार के साफ सुथरे पांवों को
गंदा कर देती है — इसलिए
खासोआम सूचित हों आज से —
हटाना है धूल को
राष्ट्र की मदद करें
जो जहां है
वहीं जुट जाये काम में
साथ नहीं देगा जो
मौत की सजा उसको
बीच चौराहे दी जायेगी —
ढब्ब – – – ढब्ब – – – ढब – – –
तभी हवा का हल्का झोंका आया
आंगन में फटकी ज्वार की
भूसी की धांस भरता निकल गया
दादी ने छींका दो चार बार
कहानी बढ़ी आगे —
दस दिनों की जगह
दस मांस निकल गये
झाड़ुएं टूट बनती रही कचरा
बरसते रहे कोड़े
सलाहकारों की उचटती रही खालें
बेटे रत्तीराम के ही
उस वक्त आ गये आगे
भेंट किये जूते उन्होंने राजकुमार को
धूल के खिलाफ वह
पहला तोहफा था आदमी का
जिन्हें पहने राजकुमार
इतराता दनदनाता जा बैठा
सिंहासन पर
पहला फरमान जारी हुआ राजकुमार का
काटे गये दोनों हाथ
रत्तीराम के बेटों के —
वे न्याय की शरण में जायें इसके पूर्व
न्यायाधीश के सर पर धर दिया गया जूता
रत्तीराम के बेटों की फरियाद
हिन्दी — हिन्दी उड़ा दी गई कचहरी बाहर
बच्चे सिसक उठे
दादी मां बोली —
रत्तीराम और उसके बेटों के हाथ तो —
जाने कब से
कटते आ रहे हैं
कटते ही रहेंगे
इतिहास में अक्सर
कहानियां
ऐसे ही बनती हैं
रोओ मत और सुनो !
राजकुमार ने तब से
सिंहासन के आसपास
उगवा दिया बगीचा
बीचोंबीच जिसके फिसलती बनी एक
फिसलता रहा वह
गोल – गोल झूला भी झूलता
झूलते उसके चापलूस ,चाटुकार
काठ के घोड़ों पर –हां ! जी !!, हां ! जी !! करते
तालियां बजाते वे
गाते
नित नये गीत
फिसली के
झूले के
एक दिन धरती ने
काठ के घोड़ों को पकड़ लिया
गिर गया राजपुत्र
गिरा तो– फिर न उठा
” अच्छा हुआ
फन्दा कटा “
खुश हुए बच्चे
दादी बोली बेटों —
राजकुमार मरता नहीं क ऽ ऽ भी ऽ ऽ
उसे बार- बार जिलाया जाता
सत्ता के चंवर से और
उसकी विरुदावलियां गाने
भेज दिये जाते भाट
गांव – गांव
नगर – नगर
तब तक दूसरे कुंवर को
पारस कहकर
बिठा दिया जाता गद्दी पर
जिसकी जूतियां
भविष्य के
सपने ठुकराती — औरों के
इनके आगे जो
करते सिर नीचा
रहते वहीं जिन्दा
अब बोलो — कटा फन्दा – – – ?
“- – – – – – – – – – “
नहीं न ?
अभी तक —
कान से –धरती से
घट से — मत्स्य से
जन्मा था आदमी
पर उस वक्त
जब नंगे पांवों से जन्मेगा
गांठ – गांठ ,तार – तार ,तत्काल खुल जायेगा फंदा – – –
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
आकार लेती यात्राएं की शीर्षक कविता के दूसरे भाग में सत्ता की बेतुकी हरकतों से दुखी आम जन की त्रासदी और तकलीफों की कहानी दादी की जुबानी सुनाई गई है। दादी भी जीवन्त इतिहास है ।जिसने जमाना देखा और जमाने में बनती – बिगड़ती जिन्दगियों के किस्से देखें और सुने ।वहीं अनुभव दादी मां अपने नाती पोतों को सुना रही है ।राजकुमार सत्ता के मुखिया होते हैं। और अपने मनमाने फरमानों ,आदेशों को जनता पर थोपते रहते हैं ।राजकुमार की इच्छा ,सुख, अय्याशियां,वैभव , ऐश्वर्य, युध्द विजय अभिलाषा सब कुछ जनता के लिए यातना ,दुख,संताप, तकलीफ का कारण बनते हैं ।ताजमहल बनाया गया ।वह संसार की नायाब इमारत हुई लेकिन इमारत बनाने वाले कारीगरों के हाथ काट दिये गये ।दुनिया को समय बताने वाले यंत्र याने घड़ी का तोहफा देने वाले घड़ी साज को अन्धा बना दिया गया ताकि दूसरी घड़ी न बन सके ।यह है मनुष्य की तरक्की के रास्ते में आयी रुकावटें ।यह संघर्ष सत्ता और सामान्य जन के बीच का है ।यह श्रमजीवी वर्ग की त्रासदी है वह जब भी सत्ता की मुश्किलों का समाधान खोजता है तब तब उसे ईनाम नहीं मिलता बल्कि उसे सजा दी जाती है उसकी बूध्दिचातुर्य की ,उसके कौशल की , उसके हुनर पर दाद दी जानी चाहिए , शाबाशी मिलनी चाहिए । लेकिन मिलता क्या है ? यह बच्चो को इसीलिए तो लगता है सत्ता हो या राजकुमार फंदा हैं । लेकिन कहा जाता है — राजा मर गया ! राजा अमर रहे ! राजा याने सत्ता कभी नहीं मरती वह किसी न किसी रुप में हर समय हर काल में जीवित ही रहती है ।सत्ता पर नये नये राजपुत्र हर समय बिठाये ही जाते हैं ।पद कभी खाली नहीं रहते ।चाहे राजा काबिल हो या न हो ।जनता राजा की काबिलियत पर सवाल नहीं उठा सकती ? क्योंकि उसे यदि जिन्दा रहना है तो सिर नीचा करना ही है ।सर झुकाना ही है ? नत मस्तक रह कर जिन्दगी जी जा सकती है । जनता की अवाम की चुप्पी ही सत्ता को दीर्घ कालिक बनाती है । सत्ता से मुक्ति का रास्ता अन्त में सुझाया गया है । अभी तक सत्ता की गद्दी के लिए अवतार धरती पर अवतरित हुए लेकिन जिस दिन यह क्रम उलट जायेगा ! जिस दिन अवतार नहीं जनता के बीच से नंगे पांवों चलकर सत्ता पर बैठेगा आदमी उस दिन सत्ता बुध्दि चातुर्य, काबिलियत, योग्य , न्याय प्रिय , मानवीय मूल्यों से भरे जन के हाथों का तंत्र होगी । वैचारिक सत्ता होगी ।तब राजकुमारों के ऊल – जलूल फरमानों के फंदों से मुक्त होगी अवाम ।तब न तो धूल को देश निकाला होगा न काठ के घोड़ों पर बैठ कर सत्ता की सैर होगी ।न जूतियों के जरिये सपने ठुकराये जायेंगे । न सिर झुका कर जिन्दा ही रहा जायेगा ।दादी मां की कहानी में छुपे भविष्य के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना चाहिएं ।सत्ता की मनमानी और नाकाबिल सत्ताधीशों से मुक्ति का मार्ग तो हर युग में खोजा ही जाता रहा है और खोजा ही जाना चाहिए ।
