Home आकार लेती यात्राएंआकार लेती यात्राएं-आकार लेती यात्राएं

आकार लेती यात्राएं-आकार लेती यात्राएं

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आकार लेती यात्राएं
****************
( १ )
करीने से सजते जाते
जूतों की कतारों से सुरक्षित
चरण कमलों में और
चर्र – चर्र मुरादें छोड़ते
उनके नंगे पांवों में कितना फर्क है
कौन जानता है ?
उसके खौलते खून की आंच से
पिघल – पिघल कर
आकार लेती जा रही यात्राएं
हर तरफ बढ़ रहा वह
कांटे
खोबड़ो को रौंदता
पसीने की महक के साथ सर्राटे मारता
* * * * * * * * *
एक बार सूरज ने
जमदग्नि प्रिया रेणुका को
दीं थीं जो पादुकाएं
रह कर उभाने खुद
आज वही सूर्य कर्म
रत्तीराम के वंशज
आ रहे करते
पुश्तेनी वहीं प्रकाश साथ में लिए
रत्तीराम के बेटे
टकरा रहे रोज – रोज
मुखिया के उन बेटों से
हाथों में बन्दूके — तलवार है जिनके
उधर —
सूरज के झोले से
रत्तीराम के बेटे
लेते हैं –आग
और
फूंक – फूंक कर उसको
लपटों में बदलते हैं
इधर —
सत्ता चीन्ह – चीन्ह कर
सुख सिंहासन बांटती
बर्फीली राजनीति के साथ
धधकती आग को
ठण्डक में तब्दील करने का
करिश्मा दिखाने के लिए
* * * * * * * * *
सिलसिला शुरु हो गया है
धार – धार नदी बह रही है
हवा —
अन्धड़ में बदल कर
अपने अन्दर फंसी चीजों की
हड्डी पसली
एक किये दे रही
और
सन्नाटा —
गेंवड़ों में चटकने लगा ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
कविता संग्रह की शीर्षक कविता और संग्रह की अन्तिम कविता भी ।कविता एक स्क्रीन प्ले की शैली में लिखी गई है दृश्य के भीतर से दृश्य उभरते जाते हैं । एक और सरकार , सत्ता, और शासन का रौब है । चमकदार जूतों की कतार है । सभ्यता के स्तर को बखानते जूते हैं जो दरबारो , जलसों , उत्सवों के कक्षों के बाहर सजते हैं ।यह कतार अनुशासन बध्द है लेकिन आम जन को रौंदती हुई ।यह संघर्ष है की यात्रा है जो आम सामान्य और मेहनत कश,निम्न समझे जाने वाले वर्ग और समाज के ऊंचे तबके, श्रेष्ठ वर्ग के बीच का संघर्ष है । यह पांवों और चरणो के बीच का संघर्ष है । पांवों से की गई यात्राएं ही तो चरणों का निर्माण करती है फिर भी इन में फर्क है ।सामान्य मेहनत कश व्यक्ति ही तो सत्ता के लिए चमकदार जूतों का निर्माण करता है और यही जूते चरणों में सज कर श्रम जीवी पर रौब गांठता है । यह श्रम जीवी के गुस्से से उबलते खून की ही अभिव्यक्ति है जो तरह तरह की यात्राओं को जन्म दे रही है । यह वर्ग भेद का संघर्ष है जो अवर्ण और सवर्ण के बीच है ।युगों युगों से यह अन्तर भेद और सामाजिक न्याय के लिए एक लडा़ई जारी है ।निम्न वर्ग याने श्रम जीवी मजदूर की यह सतत लड़ाई अपने मार्ग में आने वाले अवरोधों को वह निरंतर रौंद रहा है ।यह संघर्ष की यात्रा है ।मेहनत कश की ऊर्जा है पसीने की महक और महक ही उसे उष्मा दे रही है इसी उष्मा की चेतना से वह निरंतर बढ़ रहा है ।यह उस जमदग्नि प्रिया की पादुकाएं पहने हैं वह जिसे सूरज ने दिया है । यहां इस पौराणिक कथा का आश्रय भी मायने रखता है ।पुरातन काल में स्त्री ,मजदूर ,श्रमजीवी ,अर्थात बढ़ई,कुम्हार, मिस्त्री, चर्मकार, रंगरेज आदि को समाज से बहिष्कृत रखा जाता था ,स्त्री को तन ढकने के लिए न्यूनतम वस्त्र धारण करने की अनुमति होती थी , सत्ता के खास ओहदेदारों के भवनों , महलों, के सामने से गुजरते हुए अपनी चप्पल हाथ में उठाकर निकलना होता था ,ज्ञान और शिक्षा पाने का अधिकार नहीं था , इसी तरह की बन्दिशे ,और पाबंदियां मेहनत कश वर्ग पर भी लागू थी ।यह समाज का उपेक्षित वर्ग होता था ये नगर ,गांव ,आबादी के बाहर अलग बस्तियों में रहकर गुजारा करते थे ।समाज में इन्हें बराबरी का दर्जा नही दिया जाता था । स्त्रियों को भी समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता था ।वे दोयम दर्जे की श्रेणी में शामिल थी । इसलिए सूरज ने जब जमदग्नि प्रिया को पादुकाएं देने का प्रसंग महत्वपूर्ण हो जाता है ।पहली बार ब्रह्माण्ड की किसी शक्ति ने स्त्री के महत्व और अस्मिता को समझा और इस प्रकार सूरज से सम्मान पाकर एक परम्परा चली जो स्त्रियों के लिए बरती जा रही उपेक्षा के दृष्टिकोण को बदलने वाली साबित हुई ।आज भी चर्मकार वर्ग खुद नंगे पांव हैं लेकिन वे समाज के उच्च वर्ग के लिए पादुकाएं बना रहे हैं ।जूते बना रहे हैं ।यह सिलसिला जमदग्नि से लेकर आज तक जारी है रत्तीराम के वंशजो तक ।यह केवल एक पुशतेनी कर्म ही नहीं वरन इसमें सूरज का प्रकाश भी शामिल हैं ।यह प्रकाश साधारण नही वरन इसमें चेतना और ज्ञान भी है ।यह स्त्री की गरिमा और मर्यादा के साथ साझा है । सूरज के झोले से रोज – रोज आग लेकर रत्तीराम के बेटे टकरा रहे मुखिया याने सत्ता के साथ सामाजिक न्याय पाने के लिए ।कि मेहनत कश का भी समाज में वजूद है ।वह भी समाज का हिस्सेदार हैं ।उसका भी भाग है समाज में ।गैर बराबरी को मिटाने का यह संघर्ष निरंतर जारी है । वर्तमान राजनीतिक समीकरण समाज में वोट बैंक की राजनीति का खेल खेलती है और दूसरी ओर वर्ग भेद की आग पर बर्फीला पानी डालती याने तुष्टीकरण करती है । लेकिन रत्तीराम के बेटे सूरज के झोले से आग लेकर उसे लपटों में बदल रहे हैं ।अब यह सत्ता और मेहनत कश वर्ग के संघर्ष का सिलसिला जारी हो गया। चेतना की हवा अन्धड़ में बदल चुकी है , गेंवडों में पसरा सन्नाटा अब चटक रहा है । याने यह वर्ग भेद की लड़ाई अब श्रम से निकल कर बुध्दि के प्रकाश से सचेत हो चुकी है ।ज्ञान का उजाला मेहनत कश की राह को आसान बना रहा है ।वह संवेदना और ज्ञान के विस्तार की अंगुली पकड़े निकल पड़ा है असमान उबड़ – खाबड़ रास्तों को समतल बनाने के लिए । आकार लेती जायेंगी यात्राएं । ये मनुष्य के विकास की यात्राएं हैं जिनमें बहुत सा अर्थ भरा है ,हार का जीत का सफलता का असफलता का यात्राएं निर्बाध जारी हैं । 🙏 विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More