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बढ़ते और घटते हुए
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मैं एक से दो तीन करता
सैंकड़ों तक जाता रहा
तुम सैकड़ों से निन्यानबे अनठान्बे करते
एक पर आकर रुकते रहे
मैं बढ़ते बढ़ते विराट
और तुम
घटते घटते टापू होते रहे ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– “ मंजती धुलती पतीली ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी की वृत्ति और स्वभाव का संकुचन और फैलाव या उदारता का मतलब समझाया गया है ।आदमी का सामाजिक व्यक्तित्व ही उसकी पहचान और परिचय होती है ।उसका आत्मीय व्यवहार ही उसका फैलाव है ।आदमी अपने प्रेम ,उदारता,सदाशयता , सहानुभूति के जरिए जीवन में एक बहुत बढ़ा मित्र समुदाय निर्मित कर लेता है ।ऐसे शुभचिंतक और शुभेच्छा रखने वाले जन समुदाय में वह पूर्णतः महफूज होता है ।यह आदमी की सबसे बड़ी ताकत होती है ।यह शख्सियत का खास गुण होता है कि वह अपने प्रेम आत्मीय उदार क्षमाशील स्वभाव से सैंकड़ों अनजान लोगों को अपना हितैषी बना लेता है ।यह आत्म विस्तार ही इस संसार की समूची उपलब्धि मानी जा सकती है । लेकिन इसी विस्तार का एक दूसरा पक्ष भी है जो अपने संकुचन से समाज को ,उसके हिस्सों को विभाजित करता जाता है ।यह विभाजन का आधार होता है जातियों , धर्मों, सम्प्रदाय,वर्ग,वर्ण ,नफरत, हिंसा ,भय , धर्मान्धता,और प्रचार -प्रसार माध्यमों से फैलाए जाते भ्रम के जरिए ।यह मनोग्रंथि भी इस अनुदारता और नफरत के भीतर सक्रिय रहती है कि वह अमुक हमारी जाति या विधर्मी है । हमारे कुल और गोत्र का नहीं है ।जब आदमी अपने संबंधों के हिस्से करने शुरु करता है तो वह खुद ब खुद सबसे ,परिवेश से ,परिजनों से कटता जाता है , दूरियां बनाता जाता है यही है घटना ।मित्र समुदाय और शुभचिंतक समुदाय का कम होना ।नफरत आदमी को अकेला और अकेला करती जाती है ।यह मनोविकार है ।संशय और आशंका भी इसमें शामिल होकर दूरियां बढ़ाने में सहायक भूमिका निबाहती है ।आशंका हर हमेशा निर्मूल और चेतना शून्य होती है ।आदमी के भीतर पनपती शंका की कोई वजह नहीं होती लेकिन मनुष्य का मन सदा संदेहशील बना रहता है ।वह यह नहीं सोच पाता है कि जब धोखे या छल -कपट की कोई वजह परस्पर नहीं होती फिर कोई भी व्यक्ति नुकसान क्यों पहुंचायेगा? हर समय संशय , संदेह पर तर्क पूर्ण विचार तो किया ही जाना चाहिए ? इस जगती में जीवन व्यतीत करने का सबसे सरल तरीका है प्रेम ,उदारता,गहरा भरोसा ,निष्कपट भाव,परस्पर दुखानुभूति , लगाव ही मनुष्य का फैलाव है ।नफरत केवल आदमी के भीतर याने अन्तरात्मा की टूटन भर है । घृणा आदमी के मनोरोगी होने का प्रमाण है ।जो व्यक्ति जितनी ही घृणा से भरा होगा वह उतना -उतना ही अविश्वसनीय व्यक्तित्व का मालिक होगा ।आदमी को हर समय मनोग्रंथि ,कुंठा,तनाव से मुक्त रहने के लिए व्यवहार को बढ़ते क्रम में स्वीकार करना होगा।घटते क्रम में किया गया लोक व्यवहार आदमी की अस्मिता को नष्ट करना है ।बढ़ना यह कोई हिसाब – किताब या बही खाते की लिखा पढ़ी नहीं है ना ही गणित का जोड़ घटाना ही है और ना ही मिजान या समीकरण है जिसे हल किया जाना है ।यह तो आदमी के सहजीवन, सामाजिक जीवन का व्यवहार रहस्य है जो परिणाम की सार्थकता का परिमाण है ।यह मात्रात्मक भाव ग्रहण या अस्वीकृति का पैमाना है ।जो जितना व्यवहार का मृदु , विनम्र, और करुणामयी होगा वह उतना विश्वासनीय होगा ।यह बढ़ने और घटने की फिक्रमंदी तो मनुष्य की चेतना में व्याप्त होनी ही चाहिए ।तब ही वह अपने वास्तविक अस्तित्व का सही अर्थ जान पायेगा ? बढ़ना हमेशा अस्तित्व गामी है और घटना हर हमेशा नाश वान होना और अपने अस्तित्व को खोना है ।अपनी अस्मिता को मिटाना है ।यह प्रेम ,आत्मीयता का सृजन ही बढ़ना है । यह तो आदमी को ही तय करना है कि वह नफरत करके घटना चाहता है या लगाव रख कर बढ़ना ?
विनीता रघुवंशी
