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दुश्मन
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सबसे ज्यादा
विश्वसनीय होता शत्रु
जिसकी कोई भी कुचाल
नही होती अविश्वसनीय कभी
वह ईर्ष्या और घृणा से
इतना वाकिफ करा देता हमें
कि नहीं रहती
कोई भी गुंजाइश लजाने की कहीं
हर वक्त लहुलुहान नजरों सोचता
अंदर से लहुलुहान होता शत्रु
और गुप्त षड्यंत्र करता हुआ भी
सबसे ज्यादा प्रकट होता है वही ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ मंजती धुलती पतीली ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी के भीतर समाये शत्रु भाव जैसे मनोविकार की पड़ताल की गई है ।शत्रुता का भाव एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव आदमी के मन पर छोड़ता है ।कभी कभी आदमी उस शत्रु भाव के जाल में भी उलझ जाता है जिसमें कोई गंभीर वजह या कारण नहीं होता। अक्सर दुशमनी की भी तीन वजहें मानी जाती है –जर याने सम्पत्ति,जोरु याने सुन्दर लावण्य मयी स्त्री , और तीसरी वजह है जमीन याने भूमि ,इन तीनों वजह से संसार के समस्त युध्द जीते गये ,लड़े गये और हारे गये ।आदमी का जीवन लालसा मय है ।उसके भीतर पाने की इच्छा है ।कामना है ।आकांक्षा है ।तलब है ।तो वह पूरी तरह संयम हीन है ।वह कोई भी इच्छित अभीप्सा के लिए जी जान से प्राणपण से कोशिश करता है ।यह इच्छा ही है जो मनुष्य के आसपास मित्र और शत्रु का जोड़ -तोड़ करती है ।मित्र एक बार मौन हो सकता है । लेकिन शत्रु निरंतर प्रयास जारी रखता है पराजित करने का ,निंदा करने का ,उपहास उड़ाने का ,समाज में नीचा दिखाने का ,लज्जित करने का ।उसकी हर गतिविधि बहुत बहुत भरोसे वाली होती है क्योंकि वह हर पल पराजित करने की इच्छा से सक्रिय रहता है । इसीलिए कबीर ने भी कहा है –“-निंदक नियरे राखिए ,आंगन कुटी छबाय, बिन पानी साबुन ,बिना निर्मल करे सुभाय ” जो निंदा करता है वह हर हमेशा के लिए हमारा मानस सचेत कर देता है । ईर्ष्या और घृणा जैसे कटुता पूर्ण मनोभाव से भी वह हमें परिचित करवा देता है । इसीलिए जब भी समाज में ऐसे मौके आते हैं जब प्रेम और अपनत्व का भाव अपनाना हो तो मन ,आत्मा तुरंत सावधान हो जाती है कि यहां झूठ ,मक्कारी ,घृणा नहीं वरन आत्मीय भाव से पेश आना है और फिर आदमी निर्णय करता है ।आत्मान्वेषन करता है और समाज के समक्ष लज्जित होने से बच जाता है क्योंकि यह परिचय शत्रु ने कराया है ।इस मायने में शत्रु ही हमारा वास्तविक हितैषी होता है ।वह हर वक्त हमारे मनोभाव में आती विकृति को दूर रखता है ।वह सही मायने में हमारा पथ प्रदर्शक होता है जो घृणा के बजाय प्रेम करने के लिए प्रेरित करता है । अन्याय करने के बदले न्याय के पक्ष में दृढ़ रहने के लिए मजबूत बनाता है ।हर वक्त ईर्ष्या ,द्वेष,कटुता की असहज मनोग्रंथि और मनो -चेतना से सतर्क रखता है शत्रु ।हर वक्त शत्रु नुकसान पहुंचाने के मंसूबे बनाता है ।वह हर समय अपने प्रतिद्वन्द्वी को लहुलुहान देखना चाहता लेकिन इस सारी कोशिशों में वह स्वयं भीतर ही भीतर लहुलुहान होता है । क्योंकि जिस रोग ग्रस्त मन: स्थिति में वह दिन रात रहेगा उसका असर उसके मनोभाव पर ,मन मस्तिष्क पर भी तो होगा ? उसके द्वारा किया गया हर षड्यंत्र ,हर साजिश जब वह चाल के रुप में चलेगा तब वह स्वयं अपने आप को उजागर ही। तो करेगा ? तब वह किस प्रकार छुपा रहेगा और किस प्रकार अपनी साजिशों भरी योजनाओं को गुप्त रख सकेगा ? सचमुच शत्रु घनघोर रुप से हमारा मित्र, हितैषी,सदाशयी गुरु , और उध्दारक करने वाला होता है ।खुद कीचड़ में अवगाहन करता है और शत्रु भाव रख कर दुश्मन के स्वभाव को कमल सा निर्मल और पवित्र ,मानवीय चेतना से परिपूर्ण करता जाता है ।पांडव न्याय के पक्ष में खड़े पांच ही थे लेकिन कौरव बहुसंख्यक होकर भी अन्याय के पक्ष में ही थे ,पांडव हों या श्री राम या श्री कृष्ण सब न्याय के पक्षधर थे रावण की शत्रुता ने श्रीराम की दृष्टि उन्मीलित की और वे नर ,वानर ,जटायु, रीछ के सहयोग से न्याय स्थापित कर पाये ।श्रीकृष्ण के सहयोग से पांडव अज्ञात वास में रहकर शत्रु से निपटने की कला सीखते रहे ।यह है कुटिल भाव से सबक सीखना ।सत्ता सदा कुटिल होती है और जनता सदा सदाशयी होती है ।जब शत्रु भाव मन में पैदा होता है तो वह विपक्ष याने द्वन्द्वी को जितना नुकसान ,हानि नहीं पहुंचाता जितना खुद द्वेष भावना में जीने वाले को ? पहले स्वयं लहुलुहान होना पड़ता है फिर विरोधी तक वह नुकसान या हानि या पराजय ,पराभव पहुंचता है ।यदि खुद नुकसान उठा कर भी किसी को हानि या पराजित करना ही है तो ऐसी शत्रुता कभी गुप्त मनोभाव बनकर छुपी नहीं रह सकती ।कवि रहीम का एक दोहा यहां प्रासंगिक है —” खैर खून खांसी खुसी बैर प्रीत मदपान ,रहिमन छुपाये ना छुपे ,जानत सकल जहान ” मतलब है -पान की पीक,लाल रंग के होंठ ,खून अर्थात कत्ल ,खांसी का ठसका बता ही देगा , खुशी के प्रसंग भी उजागर हो ही जायेंगे , बैर भी प्रकट हो ही जायेगा ,प्रीति अर्थात प्रेम का भाव या प्रसंग भी खुल ही जायेगा । इसी तरह यदि किसी ने नशा किया है ।मदिरा सेवन किया है तो वह भी अपनी दुर्गंध से सभी को जाहिर कर ही देता है । इसलिए कुटेव कैसी भी हो सब जग जाहिर हो ही जाती है ।किसी का बैर ,शत्रु भाव कभी भी रहस्य नही रह पाता है । इसलिए आदमी को खुद ब खुद द्वेष के मनोभावों में रहकर खुद को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए ।घृणा कोई उन्नति का रास्ता नहीं है यह आदमी की सबसे बड़ी हार है ,सबसे बड़ा पतन है ।
विनीता रघुवंशी
