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काफी है एक हाथ
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दरवाजे पर ताला लगाते
महसूस किया
कि आदमी के पास
दो हाथों का होना
आवश्यक है
और ताला खोलते वक्त
एक हाथ ही काफी लगा
अब समझ में आया
कि ताला खोलना हो या —
खोलना हो जमाने को
सबके लिए —
एक हाथ ही काफी है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता बहुत ही छोटी है लेकिन फिलासफी से ,दर्शन की गहराई से भरी है ।ताला प्रतीक है बन्दिशों का ।निषेध का ।रोक का ।अवरोध का ।प्रतिबन्ध और रुकावटों का ।आदमी जब भी ताकतवर होता है ,या कोई उपलब्धि ,कोई अनमोल वस्तु को प्राप्त करता है तो उसे अपनी धरोहर बनाकर उसपर ताला लगाने का काम करता है ।उसे निगरानी और पहरे में रखने की चेष्टा करता है ।उसके लिए वह साथियों से सहयोग लेता है । और परस्पर समझौते करता है । इसीलिए तो यह विचार प्रकट हुआ कि ताला लगाने के लिए दो हाथ का इस्तेमाल करना पड़ता है ।एक जैसे मनोवृत्ति के लोगों का सहयोग लेना होता है क्योंकि बन्दिशों को कायम करना होता है । इसमें परस्पर सहयोग और मदद की जरुरत होती है ।दो हाथ यहां विशेष अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं ।याने रुकावट को बरकरार रखने के लिए एक से अधिक व्यक्तियों की जरुरत पड़ती है यह हाथ होते हैं व्यवस्था के जैसे न्याय व्यवस्था ,विधायिका , संसद , शासन -प्रशासन ।बन्दिश रुकावट प्रतिबन्ध तब ही कारगर होता है जब उसकी निगाहबानी मिलकर की जाये ।केवल दरवाजै पर ताला लगा देने से ही घर सुरक्षित नहीं होता उसी पर नजर रखने के लिए चौकीदार ,पहरेदार की भी जरुरत होती है ।यह है दो हाथ का आपस में मिलना लेकिन जब ताला खोलना हो । गुत्थियां खोलनी हो तो बुध्दि और चेतना के जागने भर से यह काम आसान हो जाता है ।बुध्दि चेतना और चातुर्य के हाथ मिलने भर से दुनिया की तमाम बन्दिश का ताला खुल जाता है ।जरुरत है जागरण से युक्त एक हाथ की ।तमाम समस्याएं अपने आप हल होती जाती है ।यह एक हाथ जो चेतना से स्पन्दित हो वही सारी गुत्थियों को खोल देता है ।यह हाथ है उठा हुआ हाथ ।यह हाथ उठाना याने सहमति है बदलाव की ।दुनिया के तमाम हुक्मरानों की तानाशाही के बदलाव के लिए उठाये हाथ के रुप में ।मनुष्यता के स्थापन के लिए जताई गई सहमति के पक्ष में ।या कहें तो सत्ता की निरंकुशता के बदलाव के लिए एक उठा हुआ हाथ ही काफी है ।जरुरी नहीं है कि अमानवीय होती सत्ता के मायने सारा जहां महसूस करे बल्की एक व्यक्ति की चेतना का जाग जाना ही पर्याप्त है उसी तरह ताला खोलने के लिए केवल एक हाथ की आवश्यकता होती है ।दुनिया के हुक्मरानों के द्वारा लगाए गये सभी प्रतिबन्धों के लिए असहमति में उठा एक हाथ ही काफी है ।यह प्रतिरोध में उठा हाथ ही इतिहास को बदलने में समर्थ होता है ।एक बार पूर्ण चेतना से प्रतिरोध में हाथ उठाना ही काफी होता है फिर बदलाव ,क्रान्ति , आजादी, स्वतंत्रता,स्वायत्ता सब स्वत: स्थापित होती। जाती है ।जब तक सहमति में हाथ मिले रहेंगे तब तक माहौल में अमानवीय स्थितियां हमेशा काबिज रहेंगी ।हिंसा हमेशा शान्ति को विस्थापित और खदेड़ती रहेगी ।विरोध की चेतना से उठा हुआ हर हाथ मानवता के पक्ष में खड़ा हुआ है ।सबसे पहले मानवता की चेतना को समझना बेहद जरुरी है तब ही इतिहास के बदलाव को समझा जा सकता है ।महाभारत में श्रीकृष्ण का पांडवों के पक्ष में होना वही चेतना शील प्रतिरोध था जिसने अन्याय की सभी स्थितियां बदल डाली । वहीं चेतना का हाथ श्री राम का रहा जहां रावण राज की अमानवीय सत्ता का नाश किया ।श्री राम हों या श्री कृष्ण या महात्मा गांधी हों इन सबने न्याय के पक्ष को प्रतिष्ठित करने के लिए संघर्ष किया ।न्याय को समझना ,उसके सत्य को समझना ,और उस चक्रव्यूह को समझना जो सैंकड़ों हाथों से रचा गया है बन्दिशों के लिए । इसीलिए असहमति में उठा एक हाथ ही काफी है चेतना के जागरण के लिए ।दुनिया की अर्थ नीति , दुनिया की समाज नीति , दुनिया की बाजार नीति , दुनिया की राजनीति, दुनिया की धर्म -अध्यात्म नीति बाजार नीति को खुली नजरों से समझना बहुत बहुत जरुरी है ।तब ही मानवता पर लटके तालों को खोला जा सकेगा । आज हम दुनिया के सबसे भ्रष्टतम लोकतंत्र के साथ सांसें ले रहे हैं ? यह समझना काफी नहीं है ?
विनीता रघुवंशी
