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राम जाने-आंगन बुहारते वक्त

by Dr. Vinita Raghuvanshi
राम जाने
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सर्जना के नाम पर
चीजें ही रचीं तुमने
मैंने कविताएं
राम जाने कब तक
रहेंगी पृथ्वी पर
चीजें तुम्हारी
लेकिन मेरी कविताएं
राम के जाने के बाद भी
रामकथा की तरह
रहेंगी पृथ्वी पर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” आंगन बुहारते वक्त ” से उद्धृत )
आज की कविता आदमी के भौतिक वस्तुओं में अपनी रचनात्मकता के बिन्दु तलाशने की जो मन: स्थिति है उस पर विचार किया गया है । मनुष्य अपनी उपस्थिति चीजों में खोजता है ।वह सोचता है कि वस्तुओं के जरिए ही वह अपने आत्म बोध को ,अपनी अस्मिता को ,अपनी चेतना को ,अपने समग्र व्यक्तित्व को व्यक्त कर सकता है । इसीलिए वह खेत खरीदता है । इसीलिए वह जमीन और मकान बनाता है ।मकान और शहर नगर को सजाने संवारने के लिए वस्तुओं को सामानों की नयी नयी खोज करता है ,रचता है , बसाता है , बनाता है और बिगाड़ कर फिर जुगाड़ करता है याने आदमी का समूचा कर्म केवल और केवल वस्तुओं के माध्यम से ही संसार में अभिव्यक्त होता है ।यदि वस्तुएं न हो तो आदमी का कोई वजूद ही नहीं ।चीजें हैं तो आदमी है के उसूल पर ये दुनिया टिकी हुई है ।इस जगत में सारी कलाएं ,सारे हुनर ,सारी विद्याएं सब के सब ज्ञान वस्तुओं के आसपास ही मौजूद होते हैं ।ऐसा कोई विज्ञान ,ऐसा कोई ज्ञान ही नहीं है जिसमें केवल और केवल मनुष्य के होने की ही जरुरत हो ? उसकी चेतना की वजह बने ? चीजें हर समय और हर काल में परिवर्तनशील होती है ।इनके रखवाले और मालिक भी समय समय पर बदलते रहते हैं ।ये धरोहर और विरासत के अतिरिक्त किसी भेस में धरती पर उपलब्ध नहीं होती ।आदमी जो है वह व्याकुल होता है चीजों के लिए ।मरने मारने को उतारु होता है चीजों के लिए । हजारों हजार बरस से पृथ्वी पर जितने और जैसे भी युध्द – महायुद्ध लड़े गये उनके मूल में वस्तुओं और जमीनों के मसले ही अहम रहे ।ये युध्द के इतिहास यह बताते हैं कि वस्तुएं आदमी के वजूद को चिर स्थाई नहीं बना सकती यदि मनुष्य को धरती पर यदि कुछ प्रतिभासित करता है तो उसकी वैचारिक परिभूमि ही करती है ।यदि संसार में कुछ चिर स्थाई है तो वह उसकी करुणा मय दृष्टि है । वस्तुओं के पार ले जाने का सामर्थ्य यदि कहीं है तो वह उसकी संवेदना की ताकत है । आदमी को आदमी की परिधि में विराट अस्तित्व यदि कोई भाव दे सकता है तो वह उसके हृदय में पलता – बहता प्रेम है । मनुष्य का चेतना गत रुप यदि कहीं प्रकट होता है तो वह उसका त्याग मय भाव ही है ।साहित्य में आदमी के ये सभी रुप विद्यमान है ।हर काल में राम के करुणानिधि रुप की चेतना साहित्य और संस्कृति में सदा सदा प्रगट होती रहेगी । इसीलिए साहित्य सृजन का कर्म निकृष्ट नहीं उत्कृषृट है जो वस्तुओं से आदमी की पहचान को चिरजीवी बनाता है ।जब तक आदमी या मनुष्य रहेगा तब तक साहित्य रचा जाता रहेगा ।यह चिर आशा हमें धैर्य और एक गहरा ढांढस बंधाती है ।
🙏विनीता रघुवंशी

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