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विनीता रघुवंशी
भाषा ही होती है हमारे बीच
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(१ )
पहाड़ों की छाती से फूटते
झरनों की तरह बहते
तारों की तरह टिमटिमाते
आसमान की दहलीज पर
और अरण्यों में चहकते —
ऋचाएं गाते हैं शब्द ।
अकालग्रस्त प्रजा के
परित्राण को
कोई विदेह चलाता हल
तो आठ दस साल में ही
खेत के ऊपर
प्रकट हो जाती शब्दावतारी सीता
और गांव के
बाल गुपाल तक
बिरनी बोवनी से निपट
गेहूं चने की घूंघरी खाते
खेतों में कुलांटियां लगाते
पोर – पोर मच्छिंदरी माई की
जय जयकार से भर देते
किसान के सपनों की गोद
जहां भूसे से ज्यादा —
अनाज के थापे लगे होते खलिहानों में ।
शब्द ,वनों मैदानों कछारों —-
खेत – खलिहान ,कल- कारखानों में
अपने पद चिन्ह छोड़ते —-
तब वर्ण और श्रम की जुगलबंदी से
सरस हो उठती शस्य श्यामला
और पसीने की भाप से
छा जाते कर्म के आकाश पर
आग और पानी की
महक छोड़ते मेघ
तब किसानिन के कंठ से फूट पड़ते
फसलों के ऊर्वर गीत ।
शब्द दूब जैसे पीटते
और छिछलकर बन जाते
कथनी के कालीन
जिन पर बैठती उठती वाणियां
आरोह – अवरोह के साथ
प्रतीकों की सगुण वंदना करतीं
किन्तु यही जब वाचाल होता
तो उत्तेजना से भर जाता
तब आंखों की जगह कान
और देखें की जगह
देखें का बयान देता ।
अलग – अलग शब्द होते निराधार
और मिलाकर बिखेरते ध्वनि तरंगें
जिन्हें सजाते संवारते हुए वे
जिस समाज की रचना करते
वह बिम्ब वैभव से भरा होता
जहां व्याकरण के यंत्रियों द्वारा
निर्मित भवनों में
वाक्यों का बसेरा होता
तब एकला शब्द यूं लगता
मानों जत्रा में गुमा बच्चा हो।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता वर्ण और अर्थ के समायोजन से बनती समाज की भाषा की उत्पत्ति पर विमर्श किया गया है ।शब्द की निर्मिति कहां कहां होती है जब सब कुछ दुर्गम हो तब शब्द ऋचा बन कर प्रकट होते हैं ।तब संघर्ष करता समाज शब्दों का उद्घोष करता है ।कविता का हर अन्तराल एक महत्वपूर्ण संदर्भ से भरा हुआ है ।शब्द की खोज की शब्द कहां से जन्म लेते हैं ? पहाड़ों की छाती से ? झरनों की तरह अविरल भाव दशाओं में ? तारों की तरह टिमटिमाते हुए ? आसमान की दहलीज पर ? अरण्यों में चहकते ? ऋचाएं गाते हुए ? कहां से उभरते हैं ये शब्द मनुष्य की आत्मा के द्वार खोलते हुए । कितना कितना मंगल मय होता है शब्दों का जन्म समाज में जो अभिव्यक्ति और विचारों का वहन करते हैं ।ये सब स्थल मनुष्य की विचार ऊर्जा के ही तो प्रमाण हैं।जंगल ,पहाड़,झरने , आसमान , तारे ,ऋचाएं । जहां जहां मनुष्य है ,प्राणी है ,विचार है वहां वहां भाषा है भाषा का स्फोट है ।उद्घोष है । वह स्थान कहीं भी हो सब जगह मनुष्य और प्राणी के भीतर बनते विचार ही भाषा का रुप धारण कर लेते हैं ।भाषा का तात्पर्य है — प्रेम,घृणा ,क्रोध,,आस्था ,कृतज्ञता , सहानुभूति , दया ,करुणा ,संवेदना , सहयोग प्राणी जहां जहां भी विचरण करेगा उसके भीतर के मनोभाव और भाव दशाएं हर हमेशा व्यक्त होंगी ही ।वह चाहे विचार प्रकट करता मनुष्य हो या मूक प्राणी भावनाओं को महसूस करता हुआ हो ।क्या जहां शब्द न हो वहां भाषा विचार बनकर उपस्थित नहीं होती ? विचार है तो भाषा भी होती ही है । भाषा अकाल में भी जन्म लेती है ।यह भाषा आस्था की भाषा होती है । जहां राजा विदेह हल लेकर खेत में अकाल से प्रजा मुक्ति के लिए सन्नध्द होते हैं और शब्द अवतार ग्रहण कर सीता के रुप में धरती से प्रकट हो जाते हैं ।विदेह की वैदेही बनती है सीता । जहां राजा स्वयं प्रजा के कष्ट मिटाने खड़ा हो वहां प्रजा का संकट कैसे कायम रह सकता है ।फिर अकाल तो मच्छिंदरी माई के जयकारै में ही आसमान गुंजा देगा और खलिहान अनाज के थापों से भरे होंगे ।ये हैं मंगल मय शब्द जो प्रजा के संकट हरण को प्रस्तुत है ।परित्राण है जनता का ।शब्द की यह सामाजिक अवस्था है जहां शुभ भावनाएं ही समृध्द होती है । इसी तरह भाषा का बचाव हमेशा कर्म शील जीवन के भीतर ही होता है जहां जंगल मैदान कछार में श्रम और कर्म का सम्पुट लिए जिन्दगी नये रुप धारण करती है । फसलों की उम्मीद से भरी कंठ ध्वनि तरंगें जब गा उठती है मल्हार तो मेघ स्वत: आकाश पर उमड़ – घुमड़ जाते हैं ।यह है कर्म और श्रम का संयोजन ।शब्द जब कथनी और करनी के तालमेल को जीवन्त करते हैं तो विश्वास और भरोसे का सृजन करते हैं लेकिन जब शब्द वाचाल हो जाते केवल शब्द ही शब्द का आडम्बर होते वाणी – विलास का जरिया होते या उनमें सच्चाई नहीं होती तो वे व्यर्थ भी हो जाते हैं ।कर्म और वचन में जब सामंजस्य होता है तब ही वह सार्थक होते हैं वहां केवल शब्द नहीं होते उनमें वाणी की ऊर्जा होती है । वाचाल शब्द केवल उत्तेजना भरते हैं ।वे भ्रमित करते हैं और मिथ्या और ढकोसलों से भरे झूठ से बनते हैं । ऐसे शब्द केवल बयान होते हैं वे लिखे नहीं केवल कहे जाते हैं वे अदालतों कचहरियों की गवाही भर होते हैं ।उनका कोई आधार भी नहीं होता है ।इनका कोई लिखित वजूद नहीं होता बस देखें हुए का या बनी – बनावटी बातों का बखान होते हैं ।शब्द का अलग अलग कोई अस्तित्व नहीं होता वे केवल शब्द के ध्वनि समुच्चय होते हैं लेकिन जब ये शब्द ही व्याकरण के अनुशासन और संस्कार में बंध कर एक वाक्य का रुप धारण करते हैं तो इनका सामाजिक अस्तित्व और अस्मिता ,गरिमा होती है ।भाषा का अनुशासन एक सभ्य समाज का निर्माण करता है ।जो शब्द व्याकरण और वाक्यों में प्रयोग नहीं होते वे भाषा की दृष्टि से अनाथ होते हैं ।भाषा में बिखरे शब्दों का कोई वास्तविक अर्थ नहीं होता वे केवल अपने सीमित अर्थ को ही व्यक्त करते हैं लेकिन वाक्यों और लेखों ,आदि में प्रयुक्त शब्द अपने धव्नि प्रतीकों ,बिम्बो ,से भरे होते हैं ।भाषा हर समय समाज की चेतना ,व्यवहार और संवेदना से आती है ।भाषा समाज से ग्रहण की जाती है ।समाज का वैचारिक स्तर जितना ही उच्च होगा उसका भाषा – आचरण भी उतना ही ऊर्वर और ऊर्जा मय होगा ।
( कविता का शेष अंश फिर कल )
