Home आज की कविताभाषा ही होती हमारे बीच-नर्मदा की लहरों से

भाषा ही होती हमारे बीच-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
भाषा ही होती हमारे बीच
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( ९ )
लंबी कविता का अन्तिम अंश
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स्वयं में उलझा होता अकर्मक शब्द
और सकर्मक जीवन को सार्थक करता
रहस्यों के करीब जाकर
सारे यथार्थ खोल देता है
खोल देता उच्चारण का लोक
जहां भाषा ही आसीन होती हर जगह
हर जगह होती उसी की सत्ता
उसी का विधि विधान
हर जगह विजयी होती वहीं
वही सृष्टि के अखंड छंद में
जीवन लय की तरह भरती
जड़ – चेतन में मौज मस्ती
सुख दुख संघर्ष
और जीवन पर अटूट विश्वास भी
और स्मृति के फलक पर
रागात्मक दृश्य उकेरती
वही होती हमारे बीच ।
भाषा ही होती हमारे बीच
हर जगह मौजूद हैं वही —
हमारे तुम्हारे ,इनके उनके
सबके बीच — परिचय कराती —
जीवंत होती —
भाषा ही व्यक्त होती हर जगह !
हर जगह प्रगट होती वही !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता के अंतिम समापन अंश में भाषा के गहरे सरोकार और सभ्यता और संस्कृति ,लोक व्यवहार के सभी व्यक्त और अव्यक्त भाव जगत में कुछ सिलसिला बनता है तो वह केवल भाषा के जरिए ही बनता है । मनुष्य और प्राणी मात्र की मूक भाव दशा का व्यक्त रुप है भाषा ।जो विचार मनुष्य के हृदय में , मस्तिष्क में उभरते हैं और शब्द और निशब्द रहते हुए जो भाव- प्रवण संकेत ,हाव भाव , ध्वनि ,स्वर मुद्रा , आंगिक चेष्टाएं ,मुख – मुद्रा का प्रदर्शन होता है वह भी भाषा का ही रुप है ।व्यक्ति की भाषा का प्रयोग ही उसके मानसिक स्तर का प्रमाण बन जाता है ।उसके शब्द चयन और चेतना ,विवेक का स्तर भी भाषा से ही उजागर होता है ।शब्द अकर्मक होते हैं जो कोई कार्य और कारण की सर्जना नहीं करते ।जिस प्रकार अकर्मण्य व्यक्ति , मनुष्य संसार में ,लोक में अपने आपको प्रकट नहीं कर सकता उसी प्रकार शब्द भी अकर्मक रह कर भाषा में शब्द की सामर्थ्य प्रकट नहीं कर पाते ।इसी तरह कर्म में लीन मनुष्य समाज में अपनी प्रतिभा , अस्तित्व ,अस्मिता ,व्यक्तित्व सृजन , करके अपने आपको साबित करता है ।अपनी सामर्थ्य को जताता है ।कर्म लीन व्यक्ति जीवन के रहस्य के द्वार खोल देता है ।वह निरंतर प्रयास करता है जीवन के कठिनतम संघर्ष को सरल ,सहज बनाने की क्रिया में जुटा रहता है ।जीवन कठिन हो जाता है जब वह अनुयायी बन कर चलता है ।स्वयं जब रहस्य खोल कर जीवन संघर्ष में खड़ा होता है तो शब्द – उच्चारण के लोक खुल जाते हैं ।वह स्वयं भाषा का सर्जक हो जाता है ।हर जगह भाषा ही आसीन होती है ।भाषा की ही सत्ता हर जगह मौजूद होती है ।भाषा ही नियम रचती है ।भाषा ही हर जगह ,हर जड़ – चेतन में प्रकट होकर जीवंत लय भर्ती हैं ।भाषा का ही चमत्कार होता है कि मायूस,उदास , निराश हृदय में भी उत्साह के ,जोश के हौंसले भर दे ।कमजोर को बलवान और भयभीत को साहसी बना दे ।यह भाषा का ही कमाल होता है कि मनुष्य दुख सुख संघर्ष घनघोर वैराग्य भरी स्मृतियों पर रागात्मक जीवंत दृश्य उकेर देती है तब भी मनुष्य और मनुष्य के बीच वही होती है । समाज में यदि कुछ सबसे महत्वपूर्ण है तो वह भाषा ही है ।भाषा ही वह जरिया है जो मनुष्य के आसपास मित्र ,सखा,परिजन परिवेश का गहरा संबंध जगत का निर्माण करता है ।भाषा ही मनुष्यता और मनुष्य को सुरक्षित बनाए रखती है ।सबसे कोमल और नाजुक यदि कुछ है तो वह भाषा का सही सही इस्तेमाल करना सीखना ।भाषा की तमीज आ जाना ही सबसे बड़ी चेतना का सृजन है ।यही विवेक है ।यही मनुष्यता का सबसे सशक्त विचार भी है ।यदि भाषा में व्यक्त किए गए विचार और भावनाएं हिंसक ,नफरत भरे हैं तो वह त्याज्य होनी चाहिए भाषा का सही प्रयोग किसान ,मजदूर ,व्यापारी,बुध्दिजीवी ,और कर्मशील व्यक्ति करते हैं ।भाषा में कोमलता और भाव प्रवण स्थितियों का समायोजन होना चाहिए ।आक्रामक या व्यंग्य या ताने ,उलाहने भाषा का कभी कभी ग़लत इस्तेमाल भी है ।इस तरह की असंवेदनशील भाषा समाज में महाभारत कालीन प्रसंग और संन्दर्भ रच देती है । भाषा का प्रयोक्ता समाज होता है और उसी के संघर्ष ,सुख,दुख की अभिव्यक्ति में भाषा बनती ,रचती ,तोड़ती ,और समाज की दिशाओं को मोड़ती भी है ।भाषा अपनी सीमाओं को लांघ भी जाती है , मर्यादा के बाहर भी जाती है फिर सभ्यता और संस्कृति के नये प्रतिमान भी समाज के सामने खड़े करती है ।भाषा संस्कृति और सभ्यता का मूल परिचय है आदमी की पहचान की ।भाषा ही है जो आदमी के , मनुष्य के अन्तर की ग्रंथियों ,कुण्ठाओ, सद्गुणों से परिचित कराती है ।भाषा सत्य है ।भाषा करुणा है ।भाषा विवेक है ।भाषा विचार है ।भाषा संवेदना है । भाषा ही प्रेम है ।भाषा ही त्याग है ।भाषा ही सेवा है ।आदमी की खालिस रचना है भाषा । भाषा नहीं तो आदमी भी नहीं । 🙏विनीता रघुवंशी

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