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पत्थरों से रिसती कविताएं
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पृथ्वी में
समाते ही
ढाल लेंगी
शिलाएं
उन्हें अपने भीतर
हजारों हजार साल बाद
हू-ब-हू अक्सों का
इतिहास छिपाये
मिलेंगे फाॅसिल्स
क्या तब भी
इसी तरह
रौंदी जाती रहेगी
नालदार बूटों से
हरी भरी पहाड़ियां ?
क्या तब भी
इसी तरह
लगाया जाता रहेगा
हथकड़ियों का जंगल
इन खाकी इलाकों में ?
क्या तब भी ?
कंकाल पत्थरों की
वे चीत्कारें
नहीं सुनाई देंगी हमें
कि जिनके भीतर से
रिसती जा रही हैं
कविताएं
कल – कल करती
लगातार – —-!!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी की चेतना और समाज – सत्ता के संबंध उकेरे गये हैं । आदमी के जन्मते ही वह समाज का हिस्सा जरुर बना जाता है लेकिन उसका धीर -गंभीर चरित्र तो धीरे धीरे ही समाज की चेतना के अनुकूल ढलता है ।केवल समाज में शामिल हो जाने भर से ही वह एक व्यक्तित्व नहीं बन जाता ।उसके लिए उसे निरंतर समाज हित के उन सिलसिलों के प्रति समर्पित और सचेतन भी होना होता है तब ही वह समाज में शिलाओं के बीच अपनी पहचान और शिला के समान रुपाकृति ग्रहण कर सकता है ।आदमी का शख्स से शख्सियत में बदलना एक विशिष्ट प्रक्रिया है जो रेत से चट्टान और शिला की तरह ही सख्त और दृढ़ होकर जोखिमों का सामना करने जैसा ही है ।शिला जिस तरह ऋतुओं और समय की मार सहती है और धीरे धीरे अपने को मजबूत और कठोर ,दृढ़ बनाती है वैसे ही आदमी को भी कठोर स्थितियों का , प्रतिकूलताओं का , यातनाओं और सख्ती का सामना करना पड़ता है । उसे बार -बार अपनी चेतना ,विवेक , संवेदना ,करुणा , अहिंसा ,सेवा – सद्भाव के प्रमाण देने होते हैं । बार -बार अपनी चेतना मय वैचारिक धरातल को स्थापित करना होता है ।यह चेतना ही बार -बार भिन्न समय और भिन्न मनुष्यों में काल दर काल प्रगट होती है ।समाज की शिलाओं में दबे ये मनुष्यता के जज्बातों ,भावनाओं के फाॅसिल्स ही तो हैं जो समाज और सत्ता की कठोरता के बीच से समान परिस्थितियों में हर बार उभर आते हैं । अमानवीयता के घेरे हर बार तोड़ने के लिए आदमी को अपने वजूद को आजमाना होता है। हर बार उसे सत्ता के अधिनायक रुप से संघर्ष करना ही होगा ।यह आदमी और सत्ता के बीच के वैचारिक अन्तराल का संघर्ष है ।सत्ता हर बार अपनी साजिशों ,अपने षड्यंत्रों ,अपने स्याह कारनामों पर जन सामान्य की चुप्पी का आवरण डाले रखना चाहती है इसीलिए वह कानून ,कारागृह,दण्ड ,यातना का आतंक रचती है । वह इस खामोशी के एवज में जन सामान्य के लोभ और स्वार्थ का भी लाभ उठाती है। वह तरह- तरह के प्रलोभन देकर सामान्य जन से अपने एकाधिकार को चिर -स्थाई सत्ता रुपान्तरण , हस्तांतरण का रचाव करती है । जन मन अपनी मानवीय इच्छाओं के रौंदे जाने के लिए कब तक यह शोषण सहता रहेगा । समाज का हर आदमी हर व्यक्ति एक सरस भाव प्रवण कविता की तरह ही है जिसे हालात और सत्ता चीत्कारों से भर रही है और व्यवस्था के घेरे में वह केवल पिंजर बन चुका है ।वह एक कंकाल भर है ।व्यवस्था ने उसके तन का गदराया पन छीन लिया है ।उसके मांस को नोंच लिया है ।क्या समाज की यह अमानवीय होती स्थिति में वैचारिक परिवर्तन आयेगा ? क्या आदमी के भीतर रची जाती कविता के कोमल स्वर जन जन की सरसता और भावनात्मक तरंग को सुनने का प्रयास करेगी ? कविता का सबसे बड़ा सवाल भी यहीं से शुरु होता है ।क्या समाज अपने हर रुप को एक शिला में तब्दील करने की चेतना से अनुप्राणित होगा ? यह कविता के भीतर की चिन्ता है जिससे हर आदमी को वाकिफ तो होना ही चाहिए ।
विनीता रघुवंशी
