Home आज की कवितानेलकटर फेंककर-पहाड़ों के बीच

नेलकटर फेंककर-पहाड़ों के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
नेलकटर फेंककर
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छोटा सा नेलकटर
एक पूरी संस्कृति है
जिसके दायरे में बनते रहते हैं
जानवर से आदमी
आदमी बनने के चक्कर में हम
नाखून काटते रहे और
इसी बीच बढ़ते गये हत्यारे पहाड़ों से गेंवड़ों तक
नेलकटर वालों को
हाथ पांव के नाखूनों जैसे काटते हुए
खिलखिलाते चले आ रहे हैं हत्यारे
अब हमारे गांव की तरफ मुखातिब हैं वे
हमें नेलकटर फेंककर टूटना ही होगा उन पर
वे इधर ही आ रहे हैं !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पहाड़ों के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में यह विशिष्टता है कि सामान्य जीवन में उपयोग होने वाली मामूली वस्तु भी विचार का हेतु और प्रतीक बनकर कविता में प्रयुक्त हो कर विचार का कारक बन जाती है यहां नेलकटर इसी तरह का प्रतीक है ।नेलकटर की जरुरत आदमी के नाखून काटने का एक उपकरण या वस्तु के रुप में है । आदमी हमेशा अपने स्वरुप को संवारने ,सभ्य दिखने के लिए अपने बेतरतीब बढ़ते नाखूनों को काटता रहता है क्योंकि बढ़े हुए नाखून पशुता की निशानी है ।यह माना जाता है कि मनुष्य जब गुफाओं में जीवन व्यतीत करता था और सभ्य नहीं हुआ था तब वह अपने नाखूनों को औजार की तरह ही अपने नाखूनों का इस्तेमाल किया करता था ।धीरे -धीरे मनुष्य ने अपने ज्ञान को बढ़ाया और समाज का निर्माण किया । मनुष्य के इस सभ्य रुप के विकास की प्रक्रिया यद्यपि सामाजिक विकास के अध्ययन का विषय है । लेकिन यहां कविता में जिस नेल कटर की बात है वह भी वहीं से ताल्लुक रखती है कि आदमी अपने ज्ञान का विस्तार करते हुए इस कदर सभ्यता के जाल में फंस गया कि उस पर होने वाले पशुता के प्रहार करते हमलावर कब बढ़ आये समझ ही नहीं पाया ।आदमी ने अपना। जीवन पशुता अर्थात हिंसक स्वभाव त्यागने में ही अरसा बिता दिया लेकिन मनुष्य के स्वभाव में से हिंसा का असर तो खत्म ही नहीं हुआ ।सचमुच आदमी नेल कटर या नाखून काटने के लिए इस्तेमाल होने वाली नेरनी का ही इस्तेमाल करता रहा पर पशुता तो वृत्ति बनकर हत्या करने की होती जा रही है केवल नाखून काटकर ही आदमी जानवर से मनुष्य नहीं बन सकता उसे इस अहिंसक संस्कृति के साथ स्वभाव की संस्कृति का सामना भी करना पड़ेगा ।नेलकटर तो बाहरी उपकरण है केवल इसके उपयोग करने से तो आदमी का बाह्य रुप ही मनुष्य या आदमी की तरह हो पायेगा लेकिन सामना और यदि बदलाव करना है तो उसकी हिंसक प्रवृत्ति को बदलना होगा ।यह हिंसा का भाव तो उसके जेहन में बसा है सच में तो आदमी के अन्त:कर्ण का बदलाव जरुरी है ।नाखून तो बाहरी सज-धज के लिए संवारे जाते हैं लेकिन असल तो हिंसा की वृत्ति को आत्मा और मन-मस्तिष्क के दायरे से बाहर करना है । हिंसा नाखून में नहीं दिमाग में विचार बनी बैठी है वास्तव में तो उस हिंसा के स्वरुप से टकराना है ।नेलकटर तो सभ्यता का एक बाह्य साधन है जो बाहरी सज्जा करता है बाहरी सज्जा में व्यर्थ समय व्यतीत करने से बेहतर है आदमी के मानसिक भावान्तरण के प्रति जागरूक किया जाये ।केवल पशुता की निशानी बने नाखूनों को संवारने से आदमी के भीतर की हिंसक प्रवृत्ति की सज्जा नहीं होगी ।जरुरत तो आदमी को भीतर से संवारने की है । इसलिए जब हमारे आस-पास चारों तरफ हिंसा का माहौल गढ़ा जा चुका है तब ऐसे समय में केवल नाखून काटकर अहिंसा नहीं रची जा सकती ।अहिंसा एक विचार है ।एक अन्त:करण की पवित्रता है जो परस्पर प्राणी मात्र के जीवन का संरक्षण करती है । हां! आदमी नेल कटर से अहिंसा के विचार को अपनी धारणा को दृढ़ आधार दे सकता है ।बढ़े हुए नाखून हिंसक प्रवृत्ति के परिचायक हैं ।भारतीय संस्कृति सौन्दर्य के इस तरह के माप दण्ड जिनसे हिंसा झलकती है का पक्षपोषण नहीं करती इसीलिए प्राचीन समय से ही बढ़े हुए नाखूनों को स्त्री सौन्दर्य में लक्षित नहीं किया जाता है । नाखूनों को बढ़ाने का चलन तो पश्चिमी सभ्यता के समाज में प्रवेश करने से हुआ है ।हमारे सौन्दर्य और लावण्य के मापदण्ड तो वृत्ति गत सौन्दर्य परक ही रहे हैं ।हमारे यहां सौन्दर्य को दैवीय रुप की आभा से तौला जाता है जब कि पश्चिमी सभ्यता में अप्सरा नहीं वरन जादूगरनी और कुटिल स्त्री की वृत्ति को मनोहारिणी माना जाता है ।यह स्वभाव गत भेद है । इसलिए समाज के बाहरी रुप को संवारने में वक्त नहीं बिताया जाना चाहिए क्यों कि घर की चौखट तक हिंसक इरादे घुस आये हैं ।सभ्यता के आवरण छोड़कर याने नेल कटर छोड़कर भीतरी मानवीय धरातल को शिक्षित और सम्हालने की जरुरत है ।भारतीय संस्कृति के भटके और बहकाये गये मूल भाव करुणा , संवेदना , अहिंसा , सद्भाव , सौहार्द ,समन्वय को पुनः जीवित करने की जरुरत है । यही मनुष्य के भीतर बैठी हिंसा की वृत्ति का सही उपचार है ।समाज में बढ़ती हिंसा समाज के लिए घातक है ।महात्मा गांधी जी को एक गोडसे ने मारा लेकिन आज वर्तमान में हर घर में एक गोडसे जनम चुका है ।यह बहुत बुरे हालात का दौर है ।इस पशुता से मुक्त होने के लिए स्वभाव और वृत्ति को लेकर विचार तो रचने ही होंगे ।हर एक को अपनी वृत्तियों को अहिंसा के माप-तौल पर जांचना और परखना होगा । हम में कितनी नफरत और कितना प्रेम और लगाव है ।हम सचमुच अपने देश से प्रेम करते हैं तो घृणा से इसे नष्ट नहीं करेंगे ।कविता में वर्तमान को संवाद के साथ प्रगट किया है ।यह माहौल से रु – ब- रु हमें बातचीत करते हुए कराती है जो कविता के यथार्थ को दर्शाता है । वैचारिक बोध से आमना सामना करती यह रचना विशिष्ट बन पड़ी है । 🙏विनीता रघुवंशी

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