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विनीता रघुवंशी
आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही
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( ४ )
गोद में लिये
खिला रही होती तुझे
तो दुनिया भर की
अलाय – बलाय
झपकी मारते ही
भागती नजर आतीं
और जब भी तेरे साथ
मांगती दुआएं
दुनिया भर के बच्चों के लिए
तो मेरे
स्तनों से
अपने आप
फूट पड़तीं —
दूध की धार
तुझे कनिया लिये
जब जब
दर्पण के सामने खड़ी होती
तब तब मुझे
अपने मां होने की
एक विराट छवि
दिखाई देती
तब सिर से पांव तक
पृथ्वी के मानिंद लगती
जिसकी कनिया में
पहाड़ ,जंगल ,सागर
गांव ,नगर ,महानगर
एक साथ किलकते
तब तैर उठता
पोर पोर में
सुगंध – सा
तेरे पिता का वह चरम आलिंगन
जिसके संचरण से
मेरे खुले गर्भ में
तेरा आधान हुआ था
और मैंने
अपनी कोख में
अभिषेक की उन बूंदों को
महसूस किया था
जो अंत: करण की जलहरी में
समातीं रही
समर्पण के
उन क्षणों में
स्त्री और मां होने की
प्रतीति से
ख़बरें हो गए थे
एक एक रोएं मेरे
और समाज गया था
सृजन का —
अव्यक्त आनंद आत्मा में ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — ” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता —” आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही ” के आज के अंश में मातृत्व का वह अहसास जो किसी भी स्त्री को मां बनने पर हो सकता है ।स्त्री से मां बन जाना एक विराट आत्मा अनुभूति है ।स्त्री की वह समग्र चेतना ही बदल जाती है जब वह मां बनती है ।मां होने का भाव महसूस करती है ।जब भी वह अपने शिशु को गोद में उठाकर दुनिया भर के बच्चों के लिए दुआ मांगती है ।उनके लिए मंगल कामना करती है तो वह मां सीमा से परे जगत जननी बन जाती है ।स्तनों में दूध की धार फूट पड़ती है ।यह कितना अद्भुत और अलौकिक भाव है जहां अपने बच्चे से निकलकर धरती के तमाम बच्चों की क्षुधा तृप्ति का भाव ।चेतना का विस्तार जो स्व के घेरे से बाहर आत्म मुक्त हो जाने की अवस्था ।यही अवस्था तो जगत जननी की भाव दशा है ।मां का दर्पण देखना भी आत्मा की मुक्तावस्था का ही परिणाम है जहां वह समस्त पृथ्वी के मानिन्द अपने आप को महसूस कर रही है ।वह अब एक शिशु की माता नहीं वरन दुनिया भर के शिशुओं की ,पहाड़ की जंगल की ,सागर के अन्तस्तल में किलोल कर रहे जीवन की संरक्षिका है ।माता है पालन हार है ।गांव ,नगर,महानगर सब दूर जो जीवन छाया है वह उन सब जीवों की ,प्राणों की , पालन हार और मां है ।यह मां की छवि का विराट हो जाना ही तो चेतना का आत्म विस्तार है ।यही तो जगत गर्भा माता का सौम्य रुप है । यह सिर से पांव तक माता की छवि का आत्म अनुभव ही तो स्त्री का वह भावजगत है जहां वह मां के उस विराट रुप को धारण कर लेती है ।मातृस्वरुपा बन कर पूजनीय हो जाती है ।यह स्त्री का रुपान्तरण ही तो है जो मां के रुप में ब्रह्माण्ड की मातृ स्वरुपात चेतना को धारण करती है ।मां के जिन नौ रुपों की कल्पना पुराणों में की गई है कहीं वह कल्पना ही तो मनुष्य के आत्म छवि में उदित होती प्रतीत नहीं होती ? यह आत्म विस्तार का चरम आलिंगन भी सुगंध की तरह बसा है आत्मा में ,मन में , यह केवल जैविक अनुभव या जैविक क्रिया भर नहीं है ।यह तो जीवन की चेतना और संवेदना का आत्म चेतन रुप है जो सृष्टि के कण कण में ऊर्जा की तरह समाया है ।यही तो सृजन की ऊर्जा और उष्मा है । यही मां होने का रोमांच है ।आज स्त्री गर्भाधान की स्थिति को केवल जैविक रुप में ही स्वीकृति देती है और अपने आप को सीमित घेरे में ही छवि को महसूस करती है । इसीलिए समाज में जो जन्म को लेकर कुत्सित विचार और महिलाओं के प्रति गैर जिम्मेदाराना रवैया अपनाया जा रहा है वह इसी भाव अवस्था का नतीजा माना जा सकता है ।स्त्री को अपने मातृ रुप की गरिमा को पुनर्स्थापित करना होगा ।उसका यह रुप और छवि ही समाज में उसकी अस्मिता को गरिमा से स्वीकार्य करेगी । स्त्री की आत्मा में समाई सृजन सौन्दर्य का आनंद ही तो वह अव्यक्त आत्मानुभूति है । स्त्री की यह चेतना ही तो उसकी विराट रुप का ,छवि का स्थापन है ।इससे इतर कुछ भी नहीं ।स्त्री का जगत जननी रुप का अनुभव ही निस्सीम है ।सीमा उसका परिचय और पहचान बिल्कुल नहीं । आज की स्त्री अपने इसी रुप से भाग रही है ।वह पुरुष के रुप और छवि को पाने के लिए लालायित हैं लेकिन यह मर्द छवि हस्तांतरण स्त्री के मौलिक रुप का नाश ही है । माता की उस सर्जक की रुप – छवि को महसूस करना ही उसकी वास्तविक मुक्ति है ।
