Home आज की कविताआठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही
******************** **********
( १ )
दुखते पांवों पर
हथेलियां फेरती मां
बीती रात के सपने सुनाने
मेरे पास बैठी है
कहती हैं —-
” एक बच्चा
सपने में आया
जिसके रोम – रोम से
भावों – विचारों के
फूट रहे थे झरने
नहा रहे थे जिनमें
कितने ही जीव
कितने ही खेतों तक
पहुंच रही थी धारें जिसकी
और कितने ही
जल,थल,नभ बिहारी
एक साथ गा रहे थे —
कोई गीत वहां
कि तभी —
वह बच्चा
एकाएक उठा
और गुनगुनाने लगा
फूटने लगी
देह से उसकी
अनेक देह
और वे
कला की शक्लों में
तब्दील होने लगी
कि तभी
नींद खुल गई “
सपनों में खोई
मां से पूछता
आठ जनवरी उन्नीस सौ
छत्तीस के बारे में
( जो मेरा जन्म दिन है )
तो वह
कुछ देर तक
मोतिया बिन्द की
धुंध को चीर
अतीत को
टटोलते हुए कहती —
” कुछ खास तो
नहीं हुआ था उस दिन
उस दिन ना तो बादल गरजे
न घटाएं बरसीं
न बिजली चमकी
न कोई आकाशवाणी हुई
न किसी देवता ने
दुंदभि दी
न आकाश से फूल बरसे
न गांव की नदी
तेरा स्पर्श करने
घर तक आई
बस तू —
पैदा भर हुआ था उस दिन
वह शायद
पूस की पूनो थी
जिसकी कड़कड़ाती ठंड से
कांप रहा था चांद
और मैं
छाती से चिपकाए रही
रात भर तुझे
रातभर भूंकता रहा कुत्ता
रुक – रुककर
बोलते रहे
गेंवड़े के पास तक सियार
और पीपल पर बैठा उल्लू
हुंकारता रहा रातभर
और तू
मेरे स्तनों के बीच
सिर दिए सोता रहा ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता —-“आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस ” एक आंकड़ा या डेट आफ बर्थ भर नहीं है ।यह हर उस संवेदनशील और करुणामई आत्मा के अवतरण या जन्म लेने की तारीख हो सकती है ।संसार में इस तारीख को और इसी दिन बहुत सारे बच्चों ने जन्म भी लिया होगा ही ।खास बात जन्मदिन में नहीं ।वरन कविता की शुरुआत में जिस तरह सपने से हुई वह हमें याद दिलाती है माता त्रिशला के सोलह स्वप्नों की जब महावीर ने धरती पर जन्म लिया तब वे एक सामान्य बच्चे ही बने रहे ।परवरिश और पारिवारिक संस्कार गुरु की चेतना भरी शिक्षा दीक्षा ने गौतम को महावीर बना दिया । एक मां अपने शिशु को लेकर जिस तरह के स्वप्न देखती है ।यह विचार ही कितना कितना खास है ।बच्चा विचारवान बने ।इसके लिए माता को ही अपने मन में कोमल तम विचार रचना पड़ते हैं । मां सुनाती है –एक बच्चा सपने में आया जिसके रोम – रोम से फूट रहे भावों – विचारों के झरने ।यह स्वप्न देखना मामूली नहीं है ।यह स्वप्न हर माता को देखना ही चाहिए ।माता ही तो संतान की शिल्पकार होती है ।माता ही गढती है बच्चे के भावी जीवन की लगन और चेतना । माता तो गांधारी भी बनी अपने सौ पुत्रों को कोई जीवन दृष्टि नही दे पाई यह इतिहास की सबसे बड़ी विडम्बना ही मानी जायेगी ? माता का स्वप्न होता है अपने नौनिहालों के जीवनस्तर और जीवन दृष्टि को विकसित करने का । इसीलिए कविता में उपस्थित मां भी बच्चे के भीतर वैचारिक झरने को फूटते हुए देख रही है ।शिशु के जन्म लेने से पूर्व ही माता के मन में सपनों का उभर आना एक संवेदनशील समाज की संरचना में सहायक होता है ।आज संतानें हैं ।माताओं की गोद में बचपन खिलखिला रहा है लेकिन मां की आंखों में उनके भविष्य के स्वप्न नजर नहीं आते ? मां के सपने में शिशु है और धरती के जीवन भी हैं जो उस शिशु की करुणामय दृष्टि में नहा रहे हैं ।ये दृष्टि प्राणीमात्र तक ही नहीं वरन खेतों तक भी पहुंच रही है ।जल,थल,नभ चारी सब मिलकर समवेत स्वर में गान कर रहे हैं ।यह कितना निरापद समय है ।एकाएक शिशु का देहान्तरण हो गया एक देह से अनेक देह फूट गई । यह देहान्तरण भी कम संवेदनशील घटना नहीं है ।यह देहान्तरण कई कई कला रुपों में व्यक्त होने लगी ।यह साधारण तो नहीं । मां का शिशु के भावी जीवन के लिए वैचारिक स्वप्न देखना और उसके अनुरुप शिशु को संस्कारित करना ,शिक्षा प्रदान करना ,सीख देना ये सब महती जिम्मेदारी होती है ।एक सामान्य मनुष्य का जन्म बिल्कुल सामान्य स्थिति ही होती ।उसके लिए कोई अलंकारिक वर्णन नहीं होता और न ही कोई कवि कभी लिखता ही है –” भये प्रगट कृपाला कौशल्या हितकारी ” का शाब्दिक सौन्दर्य ही रचता है । न घटाएं बरसतीं हैं न बिजली चमकती है ,न गांव की नदी स्पर्श करने घर तक आई ,न आकाशवाणी ही हुई ।सचमुच जन्म के समय इन सब का होना चमत्कारिक और चेतना के अवतरण का वातावरण जरुर हो सकता है ।घटना जन्म लेना नहीं होता वरन जन्म लेकर समाज हित में चेतना, विवेक और संवेदना के साथ अपनी उपस्थिति को व्यक्त कर समाज की चेतना को दृढ़ता ,मजबूती देना ही जन्म की सार्थकता है ।आपके जन्म लेने से समाज की दिशा नैतिक सदाचार की ओर उन्मुख हो तब आपका जन्मदिन सार्थक होता है ।समाज की मर्यादा और मनुष्यता को दृढ़ता मिले तो जन्म लेना सार्थक है ।आपके जन्म लेने से समाज की न्याय दृष्टि परिपक्व हो तब जन्म लेना सार्थक है ।सच ही तो महसूस कर रही मां कि बस पैदा हुआ था उस दिन। मां की छाती से चिपका नन्हा शिशु जिसका आगमन चमत्कार नहीं था लेकिन चमत्कार तो मां के सपनों में जाग रहा था जहां कलाएं सिरज रही थी समाज को , जहां मानवता का प्रस्फुटन हो रहा था विचार में । जहां जल,थल,नभ के प्राणी मात्र समवेत गान में व्यस्त रहे ।यह है मां का स्वप्न संतान के रुप में मनुष्य की संरचना का स्वप्न ।आज के समाज में यदि कुछ खत्म हुआ है तो उसके विचार करने की क्षमता और सपनों से रिक्त आंखें और दृष्टि ।अपनी आंखों में पीढ़ियों के सृजन के सपने देखिए ।यही जन्म और जन्मदिन की सार्थकता है ।वरना जन्म तारीख तो एक गणितीय संख्या भर है ? 🙏विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More