देखा, बिना नाम के तुम्हें देखा, बिना नाम के तुम्हें तो, सही दिखायी दीं तुम। खुद को भी इसी तरह देखा तो सही -सही देख लिया खुद को । अब, …
पिता कविता संग्रह – पहाड़ों के बीच (Pahadon Ke Beech) रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी. चाहे जितना सर्द गर्म हो मौसम पिता भोर के पहले उठ आते नहा धोकर रोज रोज …
यहाँ जमीन पर कविता संग्रह – पहाड़ों के बीच (Pahadon Ke Beech) रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी. ओ, सदियों से सोई घाटियों! तुम्हारे ऊपर पत्थरों की स्याह इबारतों में जो लिखा …
लहूलुहान है नदी ! कविता संग्रह (Nahi Rahne Ke Baad Bhi) नहीं रहने के बाद भी रचनाकार– श्री प्रेमशंकर रघुवंशी. गटरों के तेज़ाब से आहत छाले पड़ी देह पर बेशररम …
सिल देना चाहती हैं नदियाँ ———————————- कितने भले रहे होंगे वे जिन्होंने रची होगी नदियाँ पाला, पोसा ,बड़ा किया होगा रचे होंगे – तीज -त्यौहार -उत्सव -मेले और कितने बुरे …
जन -जन को —————— कई मर्तबा पीटा गया /पहली बार तब /जब मैं अपने गाँव जमानी की पाठशाला में /प्रभात फेरी के बाद /झण्डा गीत गाते हुए /खलिहान की जामुन …
इच्छा शक्ति—————-वे जिस चीज कोभी देखतेवही बनना चाहतेजबकिपेड़ के पास पहुँचकरपेड़नदी के पास पहुँचकरनदीखेत के पास पहुँचकरफसलचिड़िया के पास पहुँचकरचिड़ियाऔर आदमी के पास पहुँचकरआदमी नहीं बन सकेवे कुछ भी नहींबन …
खरा होने के वास्ते (“मँजती धुलती पतीली“) ~~~~~~~~~~~~ जब आपसी संवाद से ज्यादा गप्पों में कटने लगे दिन तो समझ लो — ठहराव का एक पहाड़ खड़ा होने लगा है …
