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सरस्वती दिवस पर हार्दिक अभिनन्दन 


समझना होगा
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समझना ही होगा
हां का अर्थ
ना ना करते
नहीं मिलेगा कुच्छ भी
ना नदी
ना किनारे
ना कछार
ना कोई टापू भी ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– “ मंजती धुलती पतीली ” से उद्धृत )
आज की कविता में आदमी के आसपास फैला वह यथार्थ है जिसके बीच खड़ा आदमी हर दशा हर अवस्था और हर हालात को नकार कर दूर करना चाहता है लेकिन वह अपने आसपास के सच से दूर नहीं भाग सकता ।आदमी को अपने आसपास के सच को स्वीकार करना ही होगा ।उन बदलते हालात और माहौल को तो खुली आंखों से देखना -परखना ही पड़ेगा ।केवल उनसे मुंह छुपा कर भागा नहीं जा सकता ।वह हालात चाहे अर्थ व्यवस्था से जुड़े हों , समाज व्यवस्था से जुड़ें हों ,या धर्म के सात्विक आचार -विचार के बीच का संक्रमण हो ,राजनीति के भीतर से नैतिकता के खत्म हो जाने की स्थितियां हों ,या बाजार की व्यवस्था और कृषि से जुड़े मसलें हो ।इन सब स्थितियों से बाहर खड़े होने भर से इन के भीतर की समस्या और सवाल हल नहीं होंगे ।इन के भीतर खड़े सवालों से तो आमना – सामना आदमी को करना ही होगा ? ये बातचीत से ही संभव हो सकेंगे । इसलिए ही आज के आदमी को अपनी ‘हां ‘ का मतलब समझना होगा ।यदि आप हर हालात को केवल अस्वीकार करते जायेंगे तो एक न एक दिन आप सब कुछ छोड़कर मैदान से बाहर होंगे ।उस स्थिति में केवल शरण गामी की ही दशा होगी ? इसलिए संघर्ष और कठिनाई का रास्ता तो स्वीकार करना ही होगा ? हालात से भागने पर मुख्य धारा का प्रवाह भी छूट जायेगा ।समाज छूटेगा , राष्ट्र छूटेगा, परिवार और परिजन छूटेंगे ।फिर बचेगा क्या ? ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण और गंभीर है ।पलायन समस्या का समाधान नहीं है ।हर हालात और माहौल का सामना ही समाधान है ।समाज में प्रवाहित नफरत के मनसूबे हों या भय की ,आतंक की, दबाव की , परिस्थितियां हों सबका एक मात्र रास्ता है उन्हें स्वीकार करके उनके समाधान खोजने के प्रयत्न करना ।यह प्रयत्न आदमी अपनी बौध्दिक चेतना का उपयोग करके पा सकता है । इसीलिए हर हमेशा संघर्ष की स्थितियों को अवश्यम्भावी मानकर उनके प्रति ‘हां ‘ का रवैया अख्तियार करना चाहिए ।पलायन या रण छोड़ देने से परिस्थितियां बदल नहीं जाती ।हर हालात चाहे वह घरेलू हों या बाहरी हों ।बातचीत संवाद से हल होने चाहिए । हां का अर्थ है दृढ़ता , हां का अर्थ है संकल्प, हां का अर्थ है अहिंसा , हां का अर्थ है सत्य ,हां का अर्थ है करुणा ,हां का अर्थ है सदाशयता , हां का अर्थ है सहानुभूति , हां का अर्थ है दया ,हां का अर्थ है सहायता , हां का अर्थ है शान्ति , हां का अर्थ है क्षमा ,हां का अर्थ है हौंसला , हां का अर्थ है धर्म , हां का अर्थ है न्याय , हां का अर्थ है प्रेम हां एक व्यापक अर्थ में समाया हुआ है । हां के अर्थ के भंडार के द्वार को खोलने पर सृष्टि का समारंभ मिल जाता है और ना करने पर नजदीकी खतम हो जाती है हर उस धारा से जो जीवन दायक है ।जो परमेश्वर तक जाने का मार्ग है वह कहीं छूट जाता है ।नफरत आदमी के उन्नयन में सहायक नहीं होती और हां का प्रेममय मार्ग उन्नति के सहस्र मार्ग प्रकाशवान कर देता है । इसलिए हां का रास्ता उजाले से भरा है और नफरत की ना अन्धकार के गह्वर में धकेल देती है ।हां में जीवन का उत्साह है उम़ग है उत्सव है और ना में मरण की उदासी मायूसी शोक और ग़म है । आदमी को हर दशा में हां के मायने आत्म सात करने चाहिए । हां है तो सफलता भी है ।ना है तो सब कुछ खोने की अवस्था है ।अब तय तो आदमी को ही करना है कि उसे जीवन में हां का फैलाव चाहिए या ना की संकीर्णता ।
विनीता रघुवंशी
