Home आज की कविताआठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही
*****************************
( ६ )
लंबी कविता का अन्तिम अंश
*************************
दफनाया गया
कहां कितना भूगोल
कितना बचाया गया इतिहास
कितने आखेट हुए —
देवासुर संग्राम में
कितने चढ़े इंद्रासनों के ऊपर
और किन – किन ने जुआ खेलते बुने —
चक्रवर्ती होने के सत्ता – जाल
कितने क्लीव राम गुप्तों को
विवाही गई ध्रुवस्वामिनियां
कितने पृथ्वीराजों ने
वर्ण की संयोगिताएं
कितनी बार बोला गया —-
” नरो वा कुंजरों “
कितनी बार बनी – मिटीं
और बन बनकर
ध्वस्त हुई संस्कृतियां
कब- कब गुलामों के बीच से
पैदा हुए स्वतंत्र दृष्टा स्पार्टाकस
कहां – कहां कब – कब हुए
मानवता के उध्दारक ?
इसके बाद भी
कुछ और शेष है
जो पूछना चाहते मां से
जबकि
होश सम्हालते ही तुमने
मेरे ही सामने
आजादी के सिंहद्वार से
रोशनी और अंधेरे को
एक साथ
प्रवेश करते देखा है
मां से पूछने के बजाय
अब मुझसे —
पूछने का साहस करो
यह कहता —
अगले साल आने का
वादा करके
तेजी से चला गया जन्मदिन
और बूढ़ी मां
छाती में
सृजन और ध्वंस की दास्तानें सहेजे
मेरी तरफ देखती यह सोचती हुई
निश्चिंत सी बैठी है
कि जिसका जन्मांक
श्रम के साथ जुड़ा होता है
उसका कर्मफलित हर वक्त
बुलंद होता है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज का अंश कविता में बहुत ही महत्वपूर्ण संदर्भों से युक्त है ।सत्ता की निर्ममता और क्रूरता ने हर काल हर समय और हर अतीत को अपने निर्णयों , फैसलों और सत्ता लोभ के लोमहर्षक यथार्थ से रु – ब- रु कराया है ।बहुत सी जमीन सत्ता ने अपने कब्जे में ली और उसमें जनता को शव बनाकर लिटा दिया ।यह दफनाना है भूगोल को ।एक समय भारत भूमि की पहचान जम्बूद्वीप से होती थी लेकिन यही जम्बूद्वीप अपने हिस्सों से दखल छोड़ता गया और आसपास के भूटान ,नेपाल, बंगलादेश, म्यांमार और न जाने कितने देश सीमा पर उभरते रहे ।यह भूगोल को दफनाना ही तो है ? सत्ता हर समय हर काल में इतिहास को तोड़ – मरोड़ कर ही जनता के सामने प्रस्तुत करती है ।सत्ता उसी इतिहास का संरक्षण करती है जितना उसके अनुकूल और अनुसार होता है बाकी इतिहास को वह नष्ट होने देती है ।सत्ता का एक आखेट हर समय चालू रहता है इसमें वह सत्ता के विरोधियों का शिकार करती रहती है ।यह शिकार सत्ता की शक्ति का नियामक होता है ।हर काल में सत्ताधीश अपने को देवता और विरोधी को राक्षस ही समझता है ।यह सत्ता का खेल है और हर काल हर स्थिति में यह चलता रहता है ।सत्ता एक स्वर्ग में स्थापित इंद्रासन है ।इसे पाने के लिए ,इस पर आसीन होने के लिए इस पर चढ़ने के लिए निरंतर साजिश और षड्यंत्र होते रहते हैं ।सत्ता पाने के लिए निरंतर संघर्ष होता रहता है । कितने ही राजा वंश परम्परा के कारण सत्ता पर काबिज हो जाते हैं लेकिन उनमें सत्ता के संचालन की काबलियत और योग्यता नहीं होती ।इसी संदर्भ में रामगुप्त की पुंसत्व हीनता का प्रसंग भी जाहिर हुआ है ।इस पर महाकवि जयशंकर प्रसाद का प्रसिद्ध नाटक –” ध्रुव स्वामिनी ” की कथा का उल्लेख करके समझा जा सकता है । वर्तमान भी राजनीति का पुंसत्व हीन समय माना जा सकता है ? राज्य लोलुपता का ही परिणाम है कि — नीति हीन ,नैतिकता विहीन खेल और द्यूत क्रीड़ा रच कर भी सत्ता प्राप्ति के षड्यंत्र रचे जाते हैं ।महाभारत की सम्पूर्ण कथा ही इसका प्रमाण है ।पृथ्वीराज चौहान का संयोगिता वरण हो या मेहमूद गजनवी की आंखों का लक्ष्य संधान ये सब सत्ता के दुर्व्यूह का ही प्रमाण है ।सत्ता के हित में कितनी ही बार मिथ्या भाषण किया गया ।कितने ही झूठ प्रचारित किये गये ।कितनी ही बार संस्कृतियां मिटी और बनी हड़प्पा और मोहन जोदड़ों इसके उदाहरण हैं ।यह भी उदाहरण मिलते हैं कि गुलामों और दासों के बीच से ही स्वतंत्र चेतना और दृष्टि सम्पन्न गुलाम आजादी का उद्घोष करते हैं ।ये संघर्ष चाहे श्री राम – रावण युध्द हो या श्री कृष्ण का सारथी बन महाभारत की युध्द रचना हो या महात्मा गांधी का स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ खड़े होने के प्रसंग या दुनिया के पहले गुलाम स्पार्टाकस की वह स्वतंत्र दृष्टि जिसने दुनिया भर के गुलामों – दासों को अपने हक के लिए लड़ने की दृढ़ता और दृष्टि दी ।यह बहुत विस्तृत कथन और कथाएं हैं जो मानवता के उध्दारकों से जुड़ी है । हर काल हर समय हर वक्त में मानवता के पक्ष में ,जागृति के लिए बहुत से महापुरुष और महान हस्तियां जन्मी और उन्होंने मानवता के हित में बहुत से सक्रिय प्रयास भी किए । आजादी के सिंहद्वार से रोशनी और अंधेरे के संदर्भ का खुलासा भी बहुत जरुरी है । यहां वर्तमान राजनीति का वह काला कोना भी दर्ज है जिसमें राजनीति के भीतर समाया राजनैतिक स्वार्थ ,सत्ता लोलुपता के किस्से रहस्य बने छुपे हुए हैं ।महात्मा गाधी जी के अहिंसक आन्दोलनों से मिली आजादी की रोशनी तत्काल एक अंधकार में विलीन हो गयी जब उनकी हत्या कर के राजनीति में हिंसा का हस्तक्षेप कर दिया गया ।यह सब राजनीति के भीतर पनपते माफिया का दुष्चक्र था जो आज सत्तासीन बना राजनीतिक दृष्टि की आंखें छीन चुका है ।वर्तमान राजनीति की रची गयी साजिश और कुचक्र की शिकार जनता आज तक अपने सत्य को नहीं जान पाई कि उसका नागरिक बने रहना कितना कितना जरुरी है ।हर बरस आते जन्मदिन से सवाल करना क्यों जरुरी है ? अपने जन्मदिन की सार्थकता तो राष्ट चेतना के सही जागरण में ही है । जिसका जन्म दिनांक हर वक्त कर्म और श्रम से जुड़ा है उसकी तकदीर भी हर बात बुलंद ही होती है । श्रम का सृजन और दृष्टि की स्वतंत्र चेतना ही वास्तविक जन्मदिन है । 🙏 विनीता रघुवंशी

You may also like

Leave a Comment

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More