15
आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही
*****************************
( ५ )
मां के
इसी कथन के बीच
एकाएक प्रकट हुआ
मेरा जन्म दिन
और बोला —
मैं आठ जनवरी
उन्नीस सौ छत्तीस से ही
तुम्हारे साथ हूं
कम नहीं होते इतने साल
कि जिन पर सवार हो
कितने ही पतझर बसंत
शरद -हेमंत के
रंग – गंध – स्वर – भाव
देखते – सुनते – सहते
और उन पर
अपने पंजे के निशान छोड़ते
नई सहस्राब्दी तक
आ गए
ऐसे में —
अपने देखें सुने के सिवाय
और क्या पूछना
चाहते हो मां से ?
तुमने भी तो
चांद – सूरज – तारों से भरे
आसमान में
चांदनी और धूप को
निर्वस्त्र किए जाने के
कितने ही
दृश्य देखे हैं
देखें हैं कितने ही
भीष्म पितामहों के
नमक अदायगी वाले
विवश और निर्लज्ज मौन
अग्राह्य ग्रहण भी
ग्रहण – दान भी
हिंसक मान भी
और सिर पर तने
आसमानों की
बनती मिटती
क्षितिज सीमाएं भी
कि जिन्हें संवारने
कभी भी अवतरित नहीं हुआ
एक पल को भी परमपिता
और वक्त के
आग पानी से
नहीं बच सकी बस्तियां ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —” नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
लंबी कविता —” आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस से ही ” के आज के अंश में मां की स्मृतियों के बीच खुद आकर खड़ा हो गया खुद का जन्म दिन ।लंबी कविता के पुरोधा कवि के रुप में गजानंद माधव मुक्तिबोध का नाम अग्रगण्य है ।लंबी कविता का जब उल्लेख किया जाता है तो सुमित्रानंदन पंत की परिवर्तन ,जयशंकर प्रसाद की आंसू और महाकवि निराला की राम की शक्ति पूजा को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है ।लंबी कविता की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वे कथ्य प्रधान होती है ।एक कथा का सूत्र उसमें पिरोया होता है ।महाकवि निराला की राम की शक्ति पूजा में बहुत सी अवान्तर कथाएं भी गुंथी हुई है । इसी तरह प्रस्तुत रचना में भी मां कथा की तरह शिशु जन्म का स्मरण कर रही है ।बार बार वह अपनी स्त्री छवि से बाहर मातृत्व की गरिमा मय छवि का सृजन करती है ।उस अनुभव को साझा करती है जहां अकाल मृत्यु की व्यथा भी है और विराट में लौट कर दुनिया भर की माता बन जाने की सुखानुभूति भी ।इसी तरह जब आठ जनवरी उन्नीस सौ छत्तीस का दिन आया तो जन्म दिन स्वयं आकर दुनिया जहान के तीखे तल्ख अनुभव और किस्सों को खुद ही अपने अनुभव में बयान करने लगा ।यह कविता गर्भ से जन्म और नई सहस्राब्दी तक ले आई ।आज के हालात और घटना चक्र समाज को वहीं महाभारत कालीन परस्थितियों और हालात में ले जाकर खड़ा कर देते हैं ।यह नई सहस्राब्दी एक बहुत बड़ा सवाल लेकर समाज में उपस्थित हुई है । जहां वक्त के साथ उम्र गुजरती है ।मौसम बदलते हैं और समाज नीति और राजनीति ,अर्थ नीति सब बेपर्दा होकर एक ऐसा नग्न यथार्थ रचती है जहां हर आदमी व्यवस्था के तमाशे में शामिल भीष्म पितामह की भूमिका निभा रहा है ।न्याय ठप्प पड़ा है ।विधि पंगु हो चुकी हो ।राजनीति वाचाल साजिश की गिरफ्त में हो ।सांसद और विधायक नैतिकता की पोशाक उतार चुके हों ।ऐसी दशा में चांदनी और धूप के बीच उभरती निर्वस्त्र अवस्था याने रात – दिन के बीच उभरते वे तमाम दृश्य जो अमानवीय हो चुके हैं ।जो विधि की अर्गला को तोड़ते हैं ।न्याय व्यवस्था को निठल्ला बना देते हैं ।यह सब महाभारत कालीन दशा का लौटना ही तो है ।क्या इतिहास का लौट लौट कर आना और अन्याय के दृश्यों का समाज के बीच मूक बन केवल दर्शक बने रहना ही नई सहस्राब्दी में प्रवेश और आगमन समझे जायें ।यह मूक अवस्था चाहे भीष्म पितामह की हो या समाज की दोनों ही स्थितियां समाज की निष्प्राणता , निर्लज्जता का ही प्रदर्शन है ।महाभारत में यह अग्राह्य ग्रहण क्या है ? क्या यह कुन्ती के कर्ण से कवच कुण्डल पाने की कथा तो नहीं समेटी गई है ।आज भी आधुनिक समाज जो पाने का अधिकार नहीं रखता वही पाने के लिए शक्ति का इस्तेमाल करता है ।यही तो है अग्राह्य ग्रहण । ग्रहण और दान की स्थितियां भी समाज में ही बनती मिटती है ।हिंसक मान – सम्मान भी समाज के भीतर अबूझ पहेली सा घटित हो रहा हैं ।यह हिंसक मान अपराध और अपराधियों को दिया जा रहा है और समाज मौन है ।सभी नैतिक बल हीन हो चुके हैं ? यह समाज की मृत अवस्था नहीं ? परम पिता कहता है –धर्म की हानि जब जब होगी मैं अवतरित होऊंगा ? पर आसमान और धरती सब मिलकर अपराध के अधर्म के क्षितिज तक को छू रहे हैं ऐसे अधर्म के हानि में कहां है परम पिता ? क्यों अवतरित नहीं हो रहा । बस्तियां वक्त के आग पानी से बचाई नही जा पा रही हैं ? कब आयेगा वह करुणामय इन बस्तियों को आग और पानी से बचाने ? क्या उसका अवतरण होगा ? क्या वह सचमुच बचा पायेगा ? इन मारक स्थितियों से या समाज को ही अपनी चेतना जागृत करना होगी ? सवाल विचारणीय है ।कविता के साथ हम सब भी नई सहस्राब्दी में प्रवेश कर रहे हैं ? अपनी चेतना को वैचारिक बिन्दु पर केन्द्रित करिए ।
विनीता रघुवंशी
